Bhramar ka 'Dard' aur 'Darpan'

this blog contains the pain of society. different colours of life.feelings and as seen from my own eyes .title ..as Naari..Pagli.. koyala.sukhi roti..ghav bana nasoor..ras-rang etc etc

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surendra shukla bhramar5


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गुमशुदा हूँ मैं

Posted On: 17 May, 2016  
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कविता में

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जाने क्यों आती है खुशियां

Posted On: 6 May, 2016  
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Hindi Sahitya कविता में

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तुम तो जिगरी यार हो

Posted On: 19 Apr, 2016  
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Hindi Sahitya कविता में

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आंगन सूना बिन तुलसी के

Posted On: 7 Apr, 2016  
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कविता में

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के द्वारा: shakuntlamishra shakuntlamishra

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आदरणीय भ्रमर जी, सादर ! ""तीव्र झोंके ने पर्दा उड़ा दिया सारे बाज -इकट्ठे दिखा दिया चालबाज, कबूतरबाज , दगाबाज अधनंगे कुछ कपडे पहनने में लगे दाग-धब्बे -कालिख लीपापोती में जुटे !"""" ""दुर्योधन-शकुनी मामा नहीं मरे द्यूत क्रीडा जारी है युधिष्ठिर हारे हैं कृष्ण नहीं विदुर नहीं सोच सोच कुढ़ता हूँ चीख है पुकार है मै भी अभी जिन्दा हूँ !!"" मैं कल भी ज़िंदा था, आज भी ज़िंदा हूँ, और कल भी ज़िंदा रहूँगा ! क्योंकि मैं "आम जनता"" हूँ ! मैं कल भी ज़िंदा था, आज भी ज़िंदा हूँ, और कल भी ज़िंदा रहूँगा ! क्योंकि मैं "लोकतंत्र " हूँ ! मैं कल भी ज़िंदा था, आज भी ज़िंदा हूँ, और कल भी ज़िंदा रहूँगा ! क्योंकि मैं "आम जनता का तंत्र"" हूँ ! ये चालबाज, कबूतरबाज , दगाबाज कुछ दिन और हँस लें, फिर तो रोना ही है ! सादर !

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959