Bhramar ka 'Dard' aur 'Darpan'

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किस घर बैठूं -किसका खाऊँ ?

Posted On: 23 Nov, 2011 Others में

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किस घर बैठूं -किसका खाऊँ ?

हाथी मेरा खाता पीता
सुस्त चले – रहता बस सोता
अश्वमेध का सपना आया
घोडा चुन-चुन लाया
हाथी पर चढ़ कभी परिक्रमा
जब पूरी ना हो पायी
अश्वशक्ति – कुछ मंत्री- तंत्री
ले उधार तब-इच्छा पूरी कर पायी
सूरज ढलने को आया जब
अँधेरा ना हो जाए !
इसी लिए घर आग लगाया
उजाला -कुछ दिन रह जाए !!
उत्तर हाथी, उत्तर काशी
उत्तर शिला -उत्तर लोढ़ा
चार धाम- मन में आया
साँसें अटकी -जीवित क्यों हूँ
संसद में ला पास करा लूं
अपनी मूरति – कुछ गढ़वा के
चौराहे – मंदिर -में ला -दूँ

———————————
उसका ख्याल ये देख -देख कर
दल-दल मै फंसता जाऊं
अभी एक हैं भाई मेरे
जाऊं थोडा मिल आऊँ !
कल वे बँटे दीवारों होंगे
किस घर बैठूं – किसका खाऊँ ?
——————————-
बार्डर पर जाते ही भैया
एक -मुछंडे ने – रोका !
“बौने” छोटे- वहां बहुत हैं
तेरा “कद” अब भी ऊंचा !!
वीसा -पासपोर्ट -ले आओ
बंट जाए- तो फिर- घर जाओ
अब वो गाँव देश ना प्यारा
अब ये है पर-देश
मारा मारी -विधान -सभा में
नहीं मिला सन्देश ??
———————————–
दो रोटी खाकर मै जीता
कीचड़ वाला पानी भाई
सूखे कुएं का – अब तक पीता
ये कंकाल लिए अपना मै
कैसे पासपोर्ट बनवाऊँ ?
मगरमच्छ हैं -गिद्ध बहुत हैं
भय है- ना नोचा जाऊं !
———————————-
मन चाहे पत्थर की मूरति से
मिल मै – कुछ रो आऊँ
हाड मांस का पुतला अपना
आंसू – थोडा दिखलाऊँ
————————-
इस आंसू में शक्ति बहुत है
थोडा उनको समझाऊँ !
जो सजीव “पाथर” हैं मिल लूं
आँख मिला के -बतलाऊँ
जहर भरा है जिनके रग में
आंसू थोडा- मिला के आऊँ !
मुई खाल की सांस की गर्मी से
थोडा मै पिघलाऊँ !
मन में उनके जो इच्छा है
मार -उसे थोडा मै पाऊँ !
यहाँ पे राज करेंगी मौसी
वहां पे मामा कंस !
विद्वानों को तहखाने कर
मिलकर लेंगे डँस !!
—————————–
भ्रमर ५
यच पी
२२.११.११ ८.१५-८.५४ पूर्वाह्न

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35 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Rajkamal Sharma के द्वारा
November 25, 2011

आदरणीय भ्रमर जी ….. सादर प्रणाम ! कल असल में ही पार्टी हुई थी हमारे चाय वाले के घर में पोता हुआ है …..लेकिन आप तो जानते ही है की मैं शादीशुदा नहीं हूँ इसलिए किसी अबोध का पिता भी नहीं हूँ और इसीलिए पीता भी नहीं हूँ इसलिए मेरे लिए मीठा मंगवाया था ….. लेकिन बर्फी में कच्चा मैदा मिला हुआ था अब मिलावट का दुष्परिणाम भोग रहा हूँ ….. और आपकी भक्ति की और मीठे वचनों की जहाँ तक बात है तो शायद ही हम सभी ब्लागरो में से इस मामले में आपके समकक्ष कोई ठहरता हो …… अगर मुझ खुदा के बेटे की बातो पर भरौसा नहीं है तो भागवान जी से पूछ कर कन्फर्म कर लेना …… हा हा हा हा हा हा हा हा :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    November 25, 2011

    प्रिय राज भाई भगवान् के पास क्यों भेजते हो पूछने के लिए …अभी अभी तो शनि ग्रह कटा ..हा हा हा हा हा हा हा हा..आप की मीठी खट्टी कडवी सारी बातें सर पर —अविश्वास की बात ही कहाँ पैदा होती है …जो बोले सो निहाल …सत श्री अकाल ….. अपनी सेहत का ख्याल रखियेगा …अभी नया साल आया नहीं मुबारक देते देते पार्टी भी ….बच के बर्फी मैदे से प्लास्टिक खोये से .. जाने कितनी शादियाँ अभी रचानी होंगी …बड़ा भारी कलेजा है …हम लोग तो एक भी …..आप पिया तो हैं इस लिए कहीं पिए … ह हा हा हां भ्रमर 5

वाहिद काशीवासी के द्वारा
November 25, 2011

प्रिय भ्रमर जी, राजनीति जैसे अनिवार्य एवं पावन कर्म को आज कितनी हेय दृष्टि से देखा जाने लगा है ये किसी से छुपा नहीं है। अपने निजस्वार्थ के चलते करोड़ों लोगों की भावनाओं से खेलना सर्वथा अनुचित है। कौन समझाए इन्हें मगर वक़्त हो चला है इनके हिसाब का। आभार,

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    November 25, 2011

    प्रिय वाहिद काशी वासी भाई जी बहुत सुन्दर कहा आप ने हम चुन चुन कर इन्हें राजनीति पढ़ा कर प्यार से भेजते हैं की ये हमारा सुख दुःख दूर करेंगे वहां जा हमारी आवाज बनेंगे और ये नेता हैं की तानाशाही का रास्ता अख्तियार करने लगते हैं की जो भी हो सर पटक लो हम करेंगे अपने मन की और विपक्ष कमजोर है तो कुछ भी कर डालेंगे बड़ी चिंता का विषय है …पाप का घड़ा तो फूटता है ही कभी न कभी …. आभार आप का भ्रमर ५

November 24, 2011

मगरमच्छ हैं -गिद्ध बहुत हैं भय है- ना नोचा जाऊं !! . . बिल्कुल सटीक भावाव्यक्ति भ्रमर जी । हर आम जनमानस के मन यही शंका घर कर रही है आजकल । कमाकर खाना दुश्वार होता जा रहा है । :(

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    November 25, 2011

    प्रिय संदीप जी अभिवादन ..बिलकुल सच कहा आप ने ये भ्रष्टाचार का भय गरीबों को तो बहुत सताए है वे बेचारे अपना पेट भरें की अनर्थक दान दें .. अब रोष क्रोध ज्वाला बन के इधर उधर उमड़ता दिखाई दे रहा है … आभार आप का प्रोत्साहन हेतु भ्रमर ५

Rajkamal Sharma के द्वारा
November 24, 2011

प्रिय भ्रमर जी …… सादर प्रणाम ! दिल तो मेरा भी करता है की अपने घर में अपनी ही एक मूर्त लगवाऊं …… एक कब्र अपनी बनवाऊं और जीते जी ही श्राद्ध अपना करवाऊं ….. राजनीती में गिरावट आई है और राजनेताओं की चाल और चरित्र में भी …… दूसरे को कैसे पटखनी दी जाए कैसे अपना डंका बजवाया जाए बस इसी कोशिश में यह पतन की राह पर दौड़ते चले जा रहे है …… यह माना की आपकी शैली जुदा है लेकिन इसके सरलीकरण में मेरा योगदान भी कुछ कम नहीं है ….. इसका कर्ज आपको कान्हा पर लिख कर चुकाना होगा …… हा हा हा हा हा :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    November 25, 2011

    जरुर गुरु का योगदान सब से ज्यादा होता है ..गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काके लागों पाँव ….है न ? अपना स्नेह बरसाते रहें ..सरलीकरण करते रहें आप कहेंगे इसे समझायेंगे तो सब मानेंगे भी … हम सब ऐसे ही आप की पूजा को आ जायेंगे ..मूर्ती वालों में अपना नाम मत लिखाइये नहीं कहीं हम भी आप के ऊपर लिखने लगे तो ??? तो ?? बोलिए आप के पवित्र स्थल पर हम मेला लगवाना शुरू कर दें … ह हा हा हा हा हा हा शशि भूषण जी देखिये छाये हैं थप्पड़ की महिमा गाये हैं राजनीतिज्ञं फिर भी नहीं लजाये हैं हाँ गाल पकड़ अब चलाना मन में भाये हैं भ्रमर ५

Amita Srivastava के द्वारा
November 24, 2011

आदरणीय शुक्ल जी नमस्कार स्वार्थ के लिए ये नेता देश को तोड़ रहे है ,खा रहे है , लूट रहे है और इसीलिए जनता से थप्पड़ भी खा रहे है |

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    November 24, 2011

    आदरणीया अमिता जी सच कहा आप ने ये भ्रष्ट लोग इसी थप्पड़ के लायक ही हैं कहीं जूते चल रहे हैं कहीं थप्पड़ ..लेकिन थप्पड़ मारने वाले अभी बहुत कम हैं …हाँ चलन चल पड़ा है तो अब ये प्रसाद इन को मिलता ही रहेगा … जय भवानी भ्रमर ५

nishamittal के द्वारा
November 24, 2011

स्वार्थ के लिए देश को बांटने वाले नेताओं पर आधारित रचना बहुत अच्छी है,शुक्ल जी.

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    November 24, 2011

    आदरणीया निशा जी धन्यवाद आप का प्रोत्साहन के लिए ये नेता लोग अपने को खुदा समझ जनता को ताक पर रख कुछ भी नियम कानून बनाने चल पड़े …. आभार आप का भ्रमर ५

akraktale के द्वारा
November 24, 2011

आदरणीय भ्रमरजी नमस्कार, बहुत ही सुन्दर रचना.आज गद्दी की खातिर प्रदेश को चार भागों में बांटने वाली मायावती क्या उस प्रदेश को यह आश्वासन कभी दे पाएंगी की अब इस राज्य के और चार टुकडे नहीं होंगे. मै नहीं समझता की छोटे छोटे राज्य बनाकर इनका विकास तेजी से किया जा सकता है.हाँ राज्य के कुछ नगरों का कुछ अधिक विकास संभव है. इससे तो अच्छा है की हर जिले को ही एक प्रदेश घोषित कर दिया जाए.धन्यवाद.

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    November 24, 2011

    प्रिय अशोक जी सुन्दर वक्तव्य और विचार आप के विकास करना ही हो तो घर को बिना बांटे सब कुछ किया जा सकता है आज तो पंचायत तक को बहुत कुछ अधिकार हैं लेकिन मन न हो सब भ्रष्ट हों कमीशन ही खाते रहें १०० में १० भी जमीन पर न जाए तो कितने भी टुकड़े कर बिल्ली जैसा बाँट डालें क्या होगा अपना पेट ही भरेंगे जातिगत गन्दी राजनीति बस ….जनता को अपना हक समझना होगा आभार आप का भ्रमर ५

Paarth Dixit के द्वारा
November 24, 2011

आदरणीय भ्रमर जी, नमस्कार… बहुत ही अच्छे भावों से सजी आपकी एक सुन्दर काव्य रचना..हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाए…

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    November 24, 2011

    प्रिय पार्थ दीक्षित जी धन्यवाद आप को –रचना में कुछ भाव और हालात आज के आप ने देखा सुन हर्ष हुआ ..काश सब इसे देखें और समझें ..आइये हम जागरूक रहें अगली बार के लिए .. अपना प्रोत्साहन देते रहें कृपया भ्रमर ५

minujha के द्वारा
November 24, 2011

भ्रमर जी नमस्कार छायावादी भावों से सजी अपने आप में एक अलग रचना,बधाई हो

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    November 24, 2011

    प्रिय मीनू जी धन्यवाद आप का इस रचना में आज के हालत की छवि आप को छायावाद तक पहुंचा सकी सुन हर्ष हुआ अपना प्रोत्साहन बनाये रखें आभार भ्रमर ५

Santosh Kumar के द्वारा
November 24, 2011

आदरणीय भ्रमर जी ,.सादर प्रणाम कविता को समझने और प्रशंशा करने में निपट मूरख हूँ ,..भरोदिया भाई जी की एक बात ही कहूँगा ,…भ्रमर की गूँज ही सबकुछ कह देती है ,….. दो रोटी खाकर मै जीता कीचड़ वाला पानी भाई सूखे कुएं का – अब तक पीता ये कंकाल लिए अपना मै कैसे पासपोर्ट बनवाऊँ ? मगरमच्छ हैं -गिद्ध बहुत हैं भय है- ना नोचा जाऊं !………….हार्दिक आभार आपका

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    November 24, 2011

    प्रिय संतोष जी ..आप और भरोदिया जी को भी आभार …. इस दर्द भरे माहौल में आकर वो तो नाच दिखाते हैं बने भेड़िया राज नीति सब हम को ही सिखलाते हैं …… उनके जैसे कितनों को हमने जो ताज पिन्हाया कभी वक्त आया तो उनको जूतों का हार पिन्हाया … आभार आप का बहुत …..बहुत भ्रमर ५

RaJ के द्वारा
November 24, 2011

दो पंक्ति भरमार जी वध न अगर रावण का करते ,पुजते राम नहीं बिना शक्ति के सिद्धांतों का कोई दाम नहीं आपकी पंक्तिया कभी कभी उद्वेलित कर जाती है जितनी तारीफ करें उतनी ही कम है बधाई भ्रमर जी

    RaJ के द्वारा
    November 24, 2011

    क्षमा करें भरमार को भ्रमर पढ़े सप्रेम “राज “

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    November 24, 2011

    प्रिय राज भाई सच कहा आप ने … वध न अगर रावण का करते ,पुजते राम नहीं….. हम सभी की बातें यों ही… मन में …. तन में लहर और लायें कुछ घर कर जाएँ कुछ कह सुन पायें तो तब आनंद और आये … आभार आप का प्रोत्साहन हेतु भ्रमर ५

alkargupta1 के द्वारा
November 23, 2011

बहुत बढ़िया काव्याभिव्यक्ति ,शुक्ल जी

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    November 24, 2011

    धन्यवाद अलका जी .अभिवादन ..रचना के भाव और मर्म आप ने समझे और प्रोत्साहन दिया आभार भ्रमर ५

sumandubey के द्वारा
November 23, 2011

भ्रमर जी नमस्कार, सुन्दर भाव सटीक रचना यर्थाथ परक बधाई इसके लिए शशि भाई का काव्य जवाब भी उत्तम .

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    November 24, 2011

    सुमन जी अभिवादन सच में हर आदमी त्रस्त है तो शशि भाई का समर्थन करना ही पड़ेगा ..न जाने क्या क्या खुराफात भरी हैं हमारे नेताओं में.. प्रोत्साहन के लिए आभार भ्रमर ५

shashibhushan1959 के द्वारा
November 23, 2011

आदरणीय भ्रमर जी, सादर, . किस घर बैठूं – किस घर खाऊँ ? किसको भूनूं, किसे पकाऊँ ? सोच रही हाथी की मालकिन, अब किस राह इसे ले जाऊं ? . लेकिन राह नहीं सूझेगी, हर रस्ते पर खडा भकाऊँ. सोच-सोच पगला जायेगी, किस घर बैठूं – किस घर खाऊँ ? . अच्छा-भला वृक्ष जो दिखता, काट-काट टूकड़े करवाऊं. बैठ मज़े से फिर मैं सोचूँ, किस घर बैठूं – किस घर खाऊँ ? . प्रभु, जूता ही मारना है तो कायदे से भिगो-भिगो कर मारा जाय. सधन्यवाद.

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    November 24, 2011

    ह हां ह हा आनंद दाई आप सी कला में उतने माहिर नहीं न प्रभु जी …हम तो सीख रहे हैं गुण ढंग आप से आप तक बातें पहुंचाएंगे और कुछ न कुछ तो बात बन ही जायेगी जय शिव शंकर ..भ्रमर ५ सोच-सोच पगला जायेगी, किस घर बैठूं – किस घर खाऊँ ?

    shashibhushan1959 के द्वारा
    November 25, 2011

    आदरणीय भ्रमर जी, सादर. आपकी टिप्पणियाँ मुझे शर्मिन्दा कर रही हैं. लगता है काव्यात्मक प्रतिक्रया बंद करनी पड़ेगी. दरअसल गद्य में बहुत लिखना पडेगा, एक पैरा लिखेंगे तो अपनी एक बात कह पायेंगे, ऐसे चार लाइनों में ही काम चल जाता है. हाथ चलाने में बड़ा परिश्रम करना पड़ता है, आलस लगती है, पर प्रयास करूंगा. क्षमाप्रार्थना के साथ.

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    November 25, 2011

    प्रिय शशि भूषण जी क्षमा प्रभु .. हम कवियों को तो सब बर्दाश्त करने की क्षमता होनी चाहिए ..रहती भी है ..है भी ..कोई बात बुरी तो नहीं लगी अपना अंदाज मत बदलियेगा ..तो तलवार क्या जिसमे धार नहीं .. हमें तो प्यारी लगती है आप की अदा ..और सुन्दर कला सच में हम तो सीखते रहते हैं और आप से मित्रों पर नाज करते हैं .. जय माता दी भ्रमर ५ ऐसे चार लाइनों में ही काम चल जाता है. हाथ चलाने में बड़ा परिश्रम करना पड़ता है, आलस लगती है,

allrounder के द्वारा
November 23, 2011

भ्रमर जी, नमस्कार ! भाई, आपकी अपनी ही तरह की सबसे जुदा रचना पर हार्दिक आभार !

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    November 23, 2011

    प्रिय सचिन भाई ..अच्छी लगी आप की बात …आपकी अपनी ही तरह की सबसे जुदा रचना.. कुल मिलाकर रचना आप के मन को छू सकी सुन ख़ुशी हुयी आभार भ्रमर ५

manoranjanthakur के द्वारा
November 23, 2011

फिलहाल तो हम है कविता पढ़कर मस्त बहुत सानदार

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    November 23, 2011

    प्रिय मनोरंजन जी रचना आप को अच्छी लगी आप मस्त हुए सुन ख़ुशी हुयी आभार भ्रमर ५


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