Bhramar ka 'Dard' aur 'Darpan'

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उगता सूरज -धुंध में

Posted On 16 Jun, 2012 Others में

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उगता सूरज -धुंध में
——————–
कर्म फल -गीता
क्रिया -प्रतिक्रिया
न्यूटन के नियम
आर्किमिडीज के सिद्धांत
पढ़ते-डूबते-उतराते
हवा में कलाबाजियां खाते
नैनो टेक्नोलोजी में
खोजता था -नौ ग्रह से आगे
नए ग्रह की खोज में जहां
हम अपने वर्चस्व को
अपने मूल को -बीज को
सांस्कृतिक धरोहर को
किसी कोष में रख
बचा लेंगे सब -क्योंकि
यहाँ तो उथल -पुथल है
उहापोह है …
सब कुछ बदल डालने की
होड़ है -कुरीतियाँ कह
अपनी प्यारी संस्कृति और नीतियों की
चीथड़े कर डालने की जोड़ -तोड़ है
बंधन खत्म कर
उच्छ्रिंख्ल होने की
लालसा बढ़ी है पश्चिम को देख
पूरब भूल गया -उगता सूरज
धुंध में खोता जा रहा है
कौन सा नियम है ?
क्या परिवर्तन है ?
सब कुछ तो बंधा है गोल-गोल है
अणु -परमाणु -तत्व
हवा -पानी -बूँदें
सूरज चंदा तारे
अपनी परिधि अपनी सीमा
जब टूटती है -हाहाकार
सब बेकार !
आँखों से अश्रु छलक पड़े
अब घर में वो अकेला बचा था
सोच-व्याकुलता-अकुलाहट
माँ-बाप भगवान को प्यारे
भाई-बहन दुनिया से न्यारे
चिड़ियों से स्वतंत्र हो
उड़ चले थे ……………
फिर उसे रोटियाँ
भूख-बेरोजगारी
मुर्दे और गिद्ध
सपने में दिखने लगते
और सपने चकनाचूर
भूख-परिवर्तन -प्रेम
इज्जत -आबरू
धर्म -कानून-अंध विश्वास
सब जंजीरों में जकड़े
उसे खाए जा रहे थे …..
——————————-
३.०२-३.४५ पूर्वाह्न
कुल्लू यच पी १३.०२.२०१२



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24 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
June 18, 2012

आदरणीय भ्रमर साब , सादर नमस्कार ! ये सब हमारा ही किया धरा है ! अभी वक्त है खुद को संभल कर चलने का ! बेहद संवेदनशील शब्द !

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    June 18, 2012

    ये सब हमारा ही किया धरा है ! अभी वक्त है खुद को संभल कर चलने का !.. प्रिय योगी जी सच है सब कुछ नहीं बिगड़ा है अभी कील धंस रही है बदन में कल ये कलेजे में न … संभल जाना अच्छा है ही … आभार आप का भ्रमर ५

dineshaastik के द्वारा
June 18, 2012

परिवर्तन  है नियम  प्रकृति का, इसे प्रकृति भी रोक  न  पाये। जड़ता को अपनाकर भारत, फिर से न गुलाम  है जाय। परिवर्तन  अपराध  नहीं है, परिवर्तन  विकास  कहलाता। अ+परिवर्तन  नहीं है कुछ  भी, यह भी परिवर्तन बन जाता।

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    June 18, 2012

    प्रिय दिनेश जी परिवर्तन होता है अवश्यम्भावी है सच है लेकिन परिवर्तन में हम भी कारक हैं कुछ तो हमारे आप के हाथ में भी रहता है आइये सुन्दर नीव दे कर अच्छा भवन खड़े करने की कोशिश तो करते रहें … परिवर्तन विकास लाये सब कुछ खो न दे तो अच्छा हो …अच्छे विन्दु हैं आप के भ्रमर ५

चन्दन राय के द्वारा
June 18, 2012

भ्रमर साहब , फिर उसे रोटियाँ भूख-बेरोजगारी मुर्दे और गिद्ध सपने में दिखने लगते और सपने चकनाचूर भूख-परिवर्तन -प्रेम इज्जत -आबरू धर्म -कानून-अंध विश्वास सब जंजीरों में जकड़े उसे खाए जा रहे थे ….. आपने आज के हालात की हकीकत के कुरूप होते रूप के चीत्कार को आवाज दे , बदलाव और बचाव की नीव राखी है , कविता के विषय में कहा हर शब्द उस स्तर के लिए छोटा होगा , सायद

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    June 18, 2012

    प्रिय चन्दन जी परिवर्तन प्रकृति का नियम है होगा ही रुकता नहीं लेकिन एक अच्छी दिशा देने का सार्थक प्रयास होते रहना चाहिए जिससे कुछ सही दिशा में विकसित हो सकें हम … आभार आप का भ्रमर ५

vinitashukla के द्वारा
June 17, 2012

भ्रमर जी, छंद मुक्त कविता द्वारा अभिव्यक्ति का आपका यह मौलिक प्रयास अच्छा रहा. बधाई.

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    June 18, 2012

    आदरणीया विनीता जी ये छंद मुक्त कविता का मौलिक प्रयास आप को अच्छा लगा सुन ख़ुशी हुयी आभार भ्रमर ५

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
June 17, 2012

मान्य भ्रमर जी, सादर !…. मुक्त छंद में मुक्त विचार अछा लगा | विकास और विनाश दोनों एक दूसरे के पूरक हैं | हार्दिक आभार ! ,

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    June 18, 2012

    आदरणीय गुंजन जी विकास और विनाश दोनों एक दूसरे के पूरक हैं |…सच कहा आप ने ..कुछ तो खोना ही पड़ता है लेकिन अधिक न खोना पड़े कुछ अपने हाथ में रह जाये तो अच्छा है .. ये मुक्त छंद की रचना आप के मन को छू सकी सुन ख़ुशी हुयी आभार भ्रमर ५

Rajkamal Sharma के द्वारा
June 17, 2012

जब दसवा ग्रह मिल जाए तो मेरी सभी रचनाये (कूड़ा –कबाड़ ) उस पर सुरक्षित रखवाने की व्यवस्था जरूर करवाइयेगा (अपने लिए जिए तो क्या जिए –अब हर रोज किसी नए ब्लागर की मशहूरी किया करूँगा ) http://krishnabhardwaj.jagranjunction.com/2012/06/17/%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%AA%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE/

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    June 18, 2012

    जरुर गुरुदेव …..लेकिन जब ये भूख बेकारी घाव नासूर हमारा पीछा छोड़ेंगे तब न ..दसवां ग्रह मिल जायेगा ..हम सब सुरक्षित होंगे और आप की कृतियाँ सब को गुदगुदाती हंसती रहेंगी वहां भी ..नयी नयी शादियों की जरूरत नहीं होगी …लोगों को मंच पर सामने लाना एक और नया अंदाज …..सुन्दर जय श्री राधे

vikramjitsingh के द्वारा
June 17, 2012

आदरणीय शुक्ल जी….सादर प्रणाम.. बहुत दिनों बाद आपका आना सुखद रहा…. आपकी रचना विचारणीय है….ये सब मानव का ही किया धरा है…. आप तो अन्तर्यामी हैं…क्या ये प्रलय की आहट है….???

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    June 18, 2012

    प्रिय विक्रम जीत जी रचना आप के मन को छू सकी आप ने भाग रही युवा पीढ़ी के दर्द और जंजाल को समझा सुन ख़ुशी हुयी …आप तो अन्तर्यामी हैं…क्या ये प्रलय की आहट है….???…प्रभु जानें प्रभु की माया हम तो केवल धरे हैं नश्वर काया …पर निश्चित ही ये अन्धानुकरण हमें गहरी खांई में खींच ले जा रहा है अच्छा हो होश में आ जाएँ अभी नासूर नहीं बना है …जब हम बो रहे हैं तो कल काटेंगे भी हम ही न ! भ्रमर ५

akraktale के द्वारा
June 16, 2012

आदरणीय भ्रमर जी नमस्कार, उच्छ्रिंख्ल होने की लालसा बढ़ी है पश्चिम को देख पूरब भूल गया -उगता सूरज धुंध में खोता जा रहा है कौन सा नियम है ? क्या परिवर्तन है ? सुन्दर प्रश्न करती पंक्तियाँ और बहुत सुन्दर रचना के लिए आपको बधाई.

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    June 18, 2012

    आदरणीय अशोक जी जय श्री राधे …ये बौखलाहट और दर्द भरी रचना जो पश्चिम की तरफ आज की युवा पीढ़ी को खींचे लिए जा रही है …आप के मन को छू सकी सुन ख़ुशी हुयी आभार भ्रमर ५

Santosh Kumar के द्वारा
June 16, 2012

आदरणीय भ्रमर जी ,..सादर प्रणाम बहुत दिनों बाद आपकी विचारशील रचना पढ़कर बहुत अच्छा लगा . सब कुछ बदल डालने की होड़ है -कुरीतियाँ कह अपनी प्यारी संस्कृति और नीतियों की चीथड़े कर डालने की जोड़ -तोड़ है बंधन खत्म कर उच्छ्रिंख्ल होने की लालसा बढ़ी है पश्चिम को देख पूरब भूल गया -उगता सूरज धुंध में खोता जा रहा है कौन सा नियम है ? क्या परिवर्तन है ?………..सूरज हमेशा पूर्व से ही उगा है ….परिवर्तन की लहर पूरब से ही उठेगी ,.सम्रद्ध परंपरा को कुरीतिओं का नाम देकर बदनाम करना हमारी निम्न मानसिकता का परिचायक है ,.आवश्यकतानुसार परिवर्तन होता ही रहता है और होता रहेगा ,…ये परम्पराएँ ही हैं की आज हमारी संस्कृति जिन्दा है …यह पीड़ा सबको है ,..नवनिर्माण के संक्रमणकाल से कोई कहाँ बचेगा !….सादर

    Ajay Kumar Dubey के द्वारा
    June 16, 2012

    जी संतोष भाई….यह संक्रमणकाल ही है. आज जो पीड़ा सबके चेहरे पर झलक रही है यह प्रसव पीड़ा के मानिंद है जिसके पाश्चात्य एक नव जीवन की उत्पत्ति ही होती है और उसका एक सुखद अहसास ही होता है.

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    June 18, 2012

    .सूरज हमेशा पूर्व से ही उगा है ….परिवर्तन की लहर पूरब से ही उठेगी ,. .प्रिय संतोष जी और अजय जी ..काश ये संक्रमण काल कुछ सुखद घड़ियों को ..विकास को ..समता को ले कर आ सके …लेकिन लोग केवल खुलेपन और फूहडपन को अधिक महत्व दे रहे हैं जो की खांई में धकेले जा रही है नयी पीढ़ी को ..काश इस से नशे से ..सब बचे और कुछ अच्छा हो…. आइये धनात्मक रुख अपनाएं ..

Ajay Kumar Dubey के द्वारा
June 16, 2012

आदरणीय भ्रमर जी सादर प्रणाम. यदि नहीं संभले और पाश्चात्य का अन्धानुकरण करते रहे तो यही होना है. अपने मूल के बिना वृक्ष टिका रह सकता है क्या ? नहीं….उसे तो गिरना ही है. उसका विध्वंस सुनिश्चित है…. यथार्थ…..को व्यक्त करती हुयी सुन्दर रचना आभार…..

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    June 18, 2012

    यदि नहीं संभले और पाश्चात्य का अन्धानुकरण करते रहे तो यही होना है. अपने मूल के बिना वृक्ष टिका रह सकता है क्या ? नहीं….उसे तो गिरना ही है. उसका विध्वंस सुनिश्चित है…. प्रिय अजय जी सुन्दर कथन आप के ..काश लोग इन बातों पर गौर करें आज जिसका भरपूर समर्थन हो रहा है वह हमारे समाज को बिगाड़ रहा है विकास की हद तक तो बात समझ आती है लेकिन नंगापन खुलापन अन्धानुकरण…. गले से नीचे नहीं उतरता … आभार आप का भ्रमर ५

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
June 16, 2012

आदरणीय भ्रमर जी , सादर अभिवादन आँखों से अश्रु छलक पड़े अब घर में वो अकेला बचा था सोच-व्याकुलता-अकुलाहट माँ-बाप भगवान को प्यारे भाई-बहन दुनिया से न्यारे चिड़ियों से स्वतंत्र हो उड़ चले थे …………… फिर उसे रोटियाँ भूख-बेरोजगारी मुर्दे और गिद्ध सपने में दिखने लगते और सपने चकनाचूर भूख-परिवर्तन -प्रेम इज्जत -आबरू धर्म -कानून-अंध विश्वास सब जंजीरों में जकड़े उसे खाए जा रहे थे … आपका ये चिंतन शिरोधार्य है. आपकी पीड़ा हम सब की पीड़ा है. दम ले ले मुसाफिर जायेगा कहाँ बधाई.

    jlsingh के द्वारा
    June 17, 2012

    आदरणीय कुशवाहा जी, सह भ्रमर जी, युगल प्रणाम! मुसाफिर जायेगा कहाँ!…. वो नयी शुबहा आयेगी और पूरब से ही आयेगी. सूरज पूरब से ही उगता आया है प्रकृति के नियम बदल कैसे जायेगी??? आभार!

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    June 18, 2012

    आदरणीय कुशवाहा जी और प्रिय जवाहर जी आभार आप दोनों का ये जन जन की पीड़ा आप के अंतर्मन तक पहुंची काश हमारे युवा भी सब साधन यहीं पायें बाहर ही न भागें और इस पूरब की संस्कृति को थामे विकास की गति दें देश को …आइये आप की बात पर उम्मीद रखे बढ़ते रहें वो नयी शुबहा आयेगी और पूरब से ही आयेगी. सूरज पूरब से ही उगता आया है प्रकृति के नियम बदल कैसे जायेगी??? भ्रमर ५


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