Bhramar ka 'Dard' aur 'Darpan'

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मेरा ‘मन’ बड़ा पापी -नहीं-मन-मोहना

Posted On: 22 Jun, 2012 Others में

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अब जे जे का नया शगूफा ? जागरण जंक्शन का होम पेज नहीं खुल रहा …और वेलकम टु यांजिंक्स आ रहा ….कैसे होम पेज के दर्शन किये जाएँ क्या सेटिंग ……. JAGRAN JUNCTION.COM WELCOME TO NGINX

मेरा ‘मन’ बड़ा पापी -नहीं-मन-मोहना
——————————————–
‘मन’ बड़ा निर्मल है
न अवसाद न विषाद
ना ज्ञान ना विज्ञान
न अर्थ ना अर्थ शास्त्र
चंचल ‘मन’ बाल हठ सा
बड़ा गतिशील है..
गुडिया खिलौने देख
रम जाता है ! कभी -
राग क्रोध से ऊपर …
न जाने ‘मन’ क्या है ?
लगता है कई ‘मन’ हैं ?
एक कहता है ये करो
दूजा “वो” करो
भ्रम फैलाता है ‘मन ‘
मुट्ठी बांधे आये हैं
खाली हाथ जाना है
किसकी खातिर फिर प्यारे
लूट मारकर उसे सता कर
गाड़ रहे –वो ‘खजाना’ हैं
प्रश्न ‘बड़ा’ करता है ‘मन’ !
माया मोह के भंवर उलझ ‘मन’
चक्कर काटते फंस जाता है
निकल नहीं पाता ये ‘मन’
कौन उबारे ? भव-सागर है
कोई “ऊँगली” उठी तो
हैरान परेशां बेचैन ‘मन’
कचोटता हैं अंतर ‘जोंक’ सा
खाए जाता है ‘घुन’ सा
खोखला कर डालता है
‘मन’ बड़ा निर्मल है
बेदाग, सत्य , ईमानदार
बहुत पसंद है इसे निर्मलता
ज्योति परम पुंज आनंद
सुरभित हो खुश्बू बिखेरते
खो जाता है निरंकार में
अपने ही जने परिवार में
इनसे स्नेह उनसे ईर्ष्या
कौड़ी के लिए डाह-कुचक्र
देख -देख ‘मन’ भर जाता है
बोझिल हो ‘मन’ थक जाता है
‘मन’ बड़ा ‘जालिम ‘ है
प्रेम, प्रेमी, प्रेमिका, रस-रंग
हीरे -जवाहरात महल आश्रम छोड़ ‘मन’
न जाने क्यों कूच कर जाता है …..
कहाँ चला जाता है ‘मन’ ??
कौन है बड़ा प्यारा रे ! बावरा ‘मन’ ??
———————————————-
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल ‘भ्रमर ‘ ५
कुल्लू यच पी -७-७.५५ पूर्वाह्न
३१.०५.२०१२



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41 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shashibhushan1959 के द्वारा
July 1, 2012

आदरणीय भ्रमर जी, सादर ! “कहाँ चला जाता है ‘मन’ ?? कौन है बड़ा प्यारा रे ! बावरा ‘मन’ ??” ये तो बड़ी उलझी हुई पहेली है ! कहाँ चला जाता है ‘मन’ ? वहाँ जहां पैसा है – प्रेम नहीं ! वहाँ जहां डिग्री है – शिक्षा नहीं ! वहाँ जहां दिखावा है – स्नेह नहीं ! वहाँ जहां कम्पुटर है – बिजली नहीं ! बेचारा बावरा ‘मन’ ??” सादर !

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    July 1, 2012

    प्रिय शशि भाई जबरदस्त व्यंग्य ..अच्छा प्रहार इन काले मन वालों के लिए …हाँ ये भी सच है नए अर्थों में … काश इनका मन इनका दिमाग अपनी जगह वापस आ जाये दिल सीने में तो मन जिन्दगी में काम आये आभार भ्रमर ५

Mohinder Kumar के द्वारा
June 25, 2012

सुरेन्द्र जी, आपने मन का सही आंकलन किया… मन अति चंचल होता है… पलक पलक बदल जाता है.. जैसे भ्रमर (भंवरा) कभी एक फ़ूल पर नहीं टिकता उसी प्रकार मन भी एक स्थान पर नहीं रहता… पर शायद रास्ता आंखों से हो कर जाता है… तभी तो किसी ने क्या खूब कहा है “आंखों ने खता की थी, आंखों को सजा देते दिन-रात तडफ़ने की इस दिल ने सजा पाई”

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    June 25, 2012

    प्रिय मोहिंदर जी जय श्री राधे तो आप ने चुटकी भी ले ही ली …..आनंद दाई जैसे भ्रमर (भंवरा) कभी एक फ़ूल पर नहीं टिकता उसी प्रकार मन भी एक स्थान पर नहीं रहता.. सच है मन अति चंचल है अगर इस घोड़े पर लगाम न लगी रहे तो न जाने क्या कब गुल खिला जाए …नियंत्रण अनुशासन बहुत जरुरी है …आभार आप का प्यारी प्रतिक्रिया … “आंखों ने खता की थी, आंखों को सजा देते दिन-रात तडफ़ने की इस दिल ने सजा पाई” अच्छा है बेचारा मन इसमें बच गया भ्रमर ५ “आंखों ने खता की थी, आंखों को सजा देते दिन-रात तडफ़ने की इस दिल ने सजा पाई”

Ravinder kumar के द्वारा
June 24, 2012

भ्रमर जी, प्रणाम. सर्वप्रथम तो आप को धन्यवाद्, आप मेरे ब्लॉग पर आये उत्साहवर्धन किया. श्रीमान जी, मन को समझते-समझते कितने ही संत-महात्मा चले गये, मन के विज्ञान को समझने के लिए ग्रन्थ पर ग्रन्थ लिखे गये,पर बड़ा जालिम है अब तक पकड़ से बाहर है. लेकिन आप का प्रयास अति प्रशंसनीय है. इतनी सुन्दर रचना के लिए आप को साधूवाद. आप की इस रचना को पढ़ कर कबीर का दोहा याद आता है- “मन गोरख मन गोबिन्दो, मन हीं औघद्द होई. जे मन राखै जतन करि, तो आपैं करता सोइ. नमस्ते जी.

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    June 25, 2012

    “मन गोरख मन गोबिन्दो, मन हीं औघद्द होई. जे मन राखै जतन करि, तो आपैं करता सोइ. प्रिय रवीन्द्र जी स्वागत है आप का यहाँ ..बहुत सुन्दर याद कराया आप ने कवीर जी की वाणी का …मन है ही ऐसा जितना शोध करिए करते रहिये मन कहाँ काबू आता है वेगवान है बलवान है कहा गया है न मन के हारे हार है मन के जीते जीत आइये मन के घोड़े पर थोडा नियंत्रण रख प्रगति के सोपान पर दौड़ते रहें भ्रमर ५

minujha के द्वारा
June 24, 2012

भ्रमर जी नमस्कार बङी कृपा है आप पर माता की,जिससे हम सभी परेशान थे,उसे आपने इतना मनमोहक  रूप दे डाला,बहुत ही सुंदर

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    June 25, 2012

    मीनू जी मन ऐसा है ही कब मन-मोहन बन जाए कब मन को सता डाले राम ही जाने …आभार प्रोत्साहन हेतु सच कहा आप ने ………. भ्रमर ५

akraktale के द्वारा
June 23, 2012

आदरणीय भ्रमर जी नमस्कार, न जाने क्यों कूच कर जाता है ….. कहाँ चला जाता है ‘मन’ ?? कौन है बड़ा प्यारा रे ! बावरा ‘मन’ ? मन को कैसे रोकें उसको एक द्वार बंद मिला तो वह झट दुसरे द्वार से भागने को दौड़ पड़ता है. कल मुझे भी जंक्शन पर आने पर सभी ब्राउसर का सहारा लेने पर भी एक सा ही मेसेज मिला. अंत में हारकर कंप्यूटर बंद ही कर देना पडा. आपने उस पर भी लिख डाला वाह! क्या बात है. जय श्री राधे.

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    June 23, 2012

    प्रिय अशोक भाई जो सामने दिख जाता है बस मन की भंडास निकाल लिया और क्या करें सोचा क्या वायरस आ गया या नयी आफत कुछ सेट्टिंग करनी होगी यां जिंक्स जी की …लेकिन देर में खुल गया अब ठीक है .. मन को रोकना मुश्किल और दुरूह तो है ही आइये धीरे धीरे पुचकारें नियंत्रित करें शायद मन मान जाए … जय श्री राधे भ्रमर ५

rekhafbd के द्वारा
June 23, 2012

सुरेन्द्र जी ,सादर नमस्ते , हीरे -जवाहरात महल आश्रम छोड़ ‘मन’ न जाने क्यों कूच कर जाता है कहाँ चला जाता है ‘मन’ ?? कौन है बड़ा प्यारा रे ! बावरा ‘मन’ ??सच में मन बांवरा है ,मन पर अति सुंदर अभिव्यक्ति पर बधाई

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    June 23, 2012

    आदरणीया रेखा जी सच कहा आप ने मन बड़ा बावरा है प्यार में रम जाता है सब कुछ छोड़ निर्मल गंगा सा ..आइये इसे समझें …आभार भ्रमर ५

allrounder के द्वारा
June 23, 2012

नमस्कार भ्रमर जी, अति सुन्दर कविता सरल शब्दों मैं बेहद गहराई भरे सन्देश दे रही है ! आभार !

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    June 23, 2012

    सचिन भाई आभार …सरल शब्द कुछ सन्देश दे सके आप के मन को रचना भायी सुन हर्ष हुआ –भ्रमर ५

yamunapathak के द्वारा
June 23, 2012

ek yaksha prashna yah bhee to thaa हवा से tej kya? मन आपकी कविता के भाव सटीक सभी का मन चंचल hava sa bhagta hai.

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    June 23, 2012

    आदरणीया यमुना जी हाँ मन की गति आंकना संभव नहीं पल भर में न जाने कहाँ पहुँच जाए क्या क्या देख ले छवि जैसे सामने सब दीदार कर रहा हो …यक्ष प्रश्न तो है ही ….. आभार भ्रमर ५

VIVEK KUMAR SINGH के द्वारा
June 23, 2012

जय श्री राधे भ्रमर जी | आपकी कविता ने मन मोह लिया | वैसे मैंने इन्टरनेट एक्स्प्लोरर में जागरण जंक्शन का होम पेज खोला , तब जाकर खुला |

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    June 23, 2012

    जय श्री राधे विवेक जी ..पहले तो इसने बड़ा तंग किया फिर गूगल क्रोम आदि में भी खुलने लगा … रचना आप के मन को मोह सकी मन ने मन से रिश्ता कायम कर लिया सुन ख़ुशी हुयी आभार भ्रमर ५

Bhupesh Kumar Rai के द्वारा
June 23, 2012

भ्रमर जी , मन के गूढ़ रहस्यों को जानने के लिए आपका प्रयास रचना के माध्यम से व्यक्त हो रहा है.मेरी शुभकामनायें.मन को जितना भी जानने का प्रयास करते हैं उतना ही रहस्यमय होता जाता है.

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    June 23, 2012

    आभार आप की शुभ कामनाओं के लिए मन को समझना आंकना बड़ा जरुरी है भूपेश जी , ये हमारी जिन्दगी को एक नयी दिशा देता है आइये इस पर नियंत्रण करने की कोशिश करते रहें … भ्रमर 5

yogi sarswat के द्वारा
June 23, 2012

मन’ बड़ा ‘जालिम ‘ है प्रेम, प्रेमी, प्रेमिका, रस-रंग हीरे -जवाहरात महल आश्रम छोड़ ‘मन’ न जाने क्यों कूच कर जाता है ….. कहाँ चला जाता है ‘मन’ ?? कौन है बड़ा प्यारा रे ! बावरा ‘मन’ ?? क्या बात है , भ्रमर साब ! मन को सन्दर्भ लेकर बहुत सुन्दर रचना कही आपने ! पसंद आई

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    June 23, 2012

    प्रिय योगी जी ये मन ही तो है न जाने कहाँ कहाँ ले कर चला जाए क्या करा दे क्या लिखा दे आइये इस पर प्यार से नियंत्रण रख अपने पास रखने की आस रखें …. आभार भ्रमर ५

Ajay Kumar Dubey के द्वारा
June 23, 2012

आदरणीय भ्रमर जी सादर प्रणाम बहुत ही सुन्दर शब्दों में मन को परिभाषित किया हार्दिक आभार……

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    June 23, 2012

    प्रिय दूबे जी मन के विषय में ये रचना कुछ तथ्य उजागर कर सकी आप का समर्थन मिला सुन ख़ुशी हुयी आभार भ्रमर ५

Punita Jain के द्वारा
June 22, 2012

आदरणीय शुक्ला जी, मन के बारे में बहुत ही सूक्ष्म ,सुन्दर और सही वर्णन किया है आपने | मन ही इस संसार में घुमाता है , मन ही संसार से पार लगाता है , जिसने मन को जीत लिया , उसने सब कुछ जीत लिया |

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    June 23, 2012

    पुनीता जी जय श्री राधे स्वागत है आप का इस ब्लॉग पर ….बहुत सुन्दर उद्गार और सटीक ..जिसने मन को जीत लिया फिर उसे और क्या कमी कुछ नहीं चाहिए …..सुन्दर अपना प्रोत्साहन यों ही बनाये रखें भ्रमर ५

santosh kumar के द्वारा
June 22, 2012

आदरणीय भ्रमर जी ,.सादर प्रणाम बहुत अच्छी रचना के लिए ह्रदय से आभार आपका ,.. मन का क्या है मन ही जाने कभी इधर तो उधर भी भागे राह कहाँ है उन सपनो की जिनको देख नींद भी भागे मन हो स्थिर तो फिर क्या है लेकिन मन तो फिर भी जागे बढे चलो उस डगर पे राही जिससे सारा देश सुभागे चलो मिटा दो उस हालत को जिससे बेचैनी भी भागे और मिले मंजिल भी हमको विश्वगुरु हो भारत जागे ……पुनः ह्रदय से आभार आपका ..सादर

    surendr shukl Bhramar5 के द्वारा
    June 22, 2012

    मन हो स्थिर तो फिर क्या है लेकिन मन तो फिर भी जागे बढे चलो उस डगर पे राही जिससे सारा देश सुभागे चलो मिटा दो उस हालत को जिससे बेचैनी भी भागे और मिले मंजिल भी हमको विश्वगुरु हो भारत जागे प्रिय संतोष जी बहुत सुन्दर रचना आप की ..क्या बात है …आप का मन आप को कवी बनाने पर लग गया है लगता है ह हा ….आभार आप का भ्रमर ५

vikramjitsingh के द्वारा
June 22, 2012

आदरणीय शुक्ल जी….सादर….. आप कहाँ फंस गए…..प्रभु….इस जंजाल में……. ये तो बहुत चंचल होता है…..’सुना है’…..और बहुत तेज़ भी….. (इसी प्रश्न ने तो पांडवों को जीवन-दान दिया था….)

    surendr shukl Bhramar5 के द्वारा
    June 22, 2012

    प्रिय विक्रम जी ये मन ही तो है …न जाने कहाँ फंसा दे और कब डूबते को तिनके सा सहारा दे निकाल दे …ये तो बहुत चंचल होता है…..’सुना है’…..और बहुत तेज़ भी….. (इसी प्रश्न ने तो पांडवों को जीवन-दान दिया था….)..बिलकुल सच्चे उदगार आप के मन ऐसा ही है … आभार भ्रमर ५

alkargupta1 के द्वारा
June 22, 2012

शुक्ला जी ,’मन ‘ पर इतनी सुन्दर भावाभिव्यक्ति मुझे लगता है कितनी भी विशेषण दें दें कम ही होंगे आखिर मन तो मन ही है सभी कुछ कह दिया उसके बारे मेंबड़ी सुन्दरता से….. बड़ी ही मनोहारी लगी रचना

    surendr shukl Bhramar5 के द्वारा
    June 22, 2012

    आदरणीया अलका जी मन के बारे में रची ये रचना आप के मन को छू सकी मन के विषय में आप ने सोचा बहुत अच्छा लगा हार्दिक आभार प्रोत्साहन हेतु भ्रमर ५

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
June 22, 2012

आदरणीय भ्रमर जी, सादर मोरा मन दर्पण कहलाये. बहुत सुन्दर वर्णन . बधाई.

    surendr shukl Bhramar5 के द्वारा
    June 22, 2012

    आदरणीय कुशवाहा जी मोरा मन दर्पण कहलाये…सही कहा आप ने मन की सुनिए और मष्तिष्क का उपयोग करिए तो बात बन जाती है मन पर नियंत्रण जरुरी होता है .. आभार भ्रमर ५

चन्दन राय के द्वारा
June 22, 2012

शुक्ल साहब , मन का ऐसा सुन्दर बखान आपने किया की आपका मन तो आप पर गर्व कर रहा होगा , ये पढ़ मेरा मन मुझे कोच रहा है की मेरे लिए भी कुछ कहो ? मन’ बड़ा निर्मल है बेदाग, सत्य , ईमानदार बहुत पसंद है इसे निर्मलता ज्योति परम पुंज आनंद सुरभित हो खुश्बू बिखेरते खो जाता है निरंकार में अपने ही जने परिवार में बेहतरीन रचना !

    surendr shukl Bhramar5 के द्वारा
    June 22, 2012

    प्रिय चन्दन जी हमें इन्तजार रहेगा आप अपने मन की सुन के कुछ उस के लिए शीघ्र लिख डालिए …..मन रे तू काहे न धीर धरे ….मन को मनाइए … आभार भ्रमर ५

jlsingh के द्वारा
June 22, 2012

आदरणीय भ्रमर जी, सादर अभिवादन! सचमुच मेरा मन बड़ा पापी है मैंने शीर्षक पढ़कर यही अनुमान लगाया कि मैडम मन मोहन को अपने कुत्सित मन के बारे में समझा रही है मैंने जो समझा उसे तो लिख दिया … अब कोई समस्या ही नहीं है … आप तो अध्यात्म में चले गए …. अभी ठहरिये …. इहलोक को सुधरने दीजिये फिर परलोक की बात करेंगे. ‘मन’ बड़ा ‘जालिम ‘ है प्रेम, प्रेमी, प्रेमिका, रस-रंग हीरे -जवाहरात महल आश्रम छोड़ ‘मन’ न जाने क्यों कूच कर जाता है ….. कहाँ चला जाता है ‘मन’ ?? कौन है बड़ा प्यारा रे ! बावरा ‘मन’ ?? मन मोहन मन में हो तुम्ही …..

    surendr shukl Bhramar5 के द्वारा
    June 22, 2012

    प्रिय जवाहर जी आप तो पहुंचे हुए फ़कीर हैं ही इस लिए सीधे मछली की आँख पर पहले निशाना साधे ठीक लगा तीर फिर कहीं न कहीं तो किसी दुसरे छोले को धारण करना ही पड़ता है काश सब आप के सधे तीर पर गौर करें और निशाना लगायें ये चूक न जाएँ आभार भ्रमर ५

    surendr shukl Bhramar5 के द्वारा
    June 22, 2012

    प्रिय जवाहर जी आप तो पहुंचे हुए फ़कीर हैं ही इस लिए सीधे मछली की आँख पर पहले निशाना साधे ठीक लगा तीर फिर कहीं न कहीं तो किसी दुसरे CHOLEY को धारण करना ही पड़ता है काश सब आप के सधे तीर पर गौर करें और निशाना लगायें ये चूक न जाएँ आभार भ्रमर ५

dineshaastik के द्वारा
June 22, 2012

आदरणीय  भ्रमर जी, भाव बहुत ही सुन्दर एवं वास्तिक है किन्तु गुस्तखी के लिये क्षमा चाहता हूँ। मन  के संबंध  में की गई व्याख्या से थोड़ा भ्रमित  हो  गया हूँ मैं। संभवतः जिसे हम  मन कहते हैं वह मस्तिक  का हीकोई भाग   होता है। मन  में वाक शक्ति नहीं होती अतः वह बोल  नहीं सकता। मन में बुद्धि नहीं होती अतः वह सोच  नहीं सकता। मैं सोचता हूँ कि मन  तो  नहीं होता, हम  मस्तिक  को ही मन का नाम  दे देते हैं।

    surendr shukl Bhramar5 के द्वारा
    June 22, 2012

    प्रिय दिनेश जी आभार ..आप का मन बड़ा जिज्ञासु है अच्छा है ..लेकिन शांत कहाँ हो सकता है ..मन बहुत चंचल है बहुत गतिशील है ये कोई पदार्थ नहीं है बिजली सा है बुद्धि सा है आत्मा से सम्बन्ध है बड़े प्रयोग हुए हैं पश्चिम के डाक्टर न जाने क्या क्या व्याख्या किये रीढ़ की हड्डी से मष्तिष्क के पीछे फिर मष्तिष्क के आगे के भाग से जहां बुद्धि और मन की सीट है जो कुछ भी है उनकी भाषा पढ़ना मानना हो तो आप पढ़िए मन कोई पदार्थ नहीं है ये मष्तिष्क तो बिलकुल नहीं है मन नहीं होता ऐसा मत सोचिये मन तो है आप का मन भी बहुत कुछ कहता होगा संवेदना देता होगा आप मन के अनुसार कार्य भी सम्पादित करते होंगे .. दिमाग तो सो जाता है मन नहीं सोता जो योगी मुनि कुण्डलिनी जागृत कर पाते हैं मन पर नियंत्रण कर लेते हैं वे कभी सोते नहीं ध्यान मुद्रा में ही पूर्ण आराम पा लेते हैं ये अपने प्रकाश से चमकता है इसे खुद ही अनुभव किया जा सकता है मन अष्ट प्रकृति में से एक है , पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, ईथर , मन, कारण, और अहम् , इन सब से ही प्रकृति बनती है मन और कुछ नहीं आत्म शक्ति है , मन आत्मा से जुडाव रखता है ये आत्मा का प्रत्यक्षीकरण सा है भ्रमर ५


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