Bhramar ka 'Dard' aur 'Darpan'

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कितने अच्छे लोग हमारे

Posted On: 26 Jun, 2012 Others में

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कितने अच्छे लोग हमारे
—————————-
JB971949

कितने अच्छे लोग हमारे
भूखे-प्यासे -नंगे घूमें
लिए कटोरा फिरें रात-दिन
जीर्ण -शीर्ण – सपने पा जाएँ
जूठन पा भी खुश हो जाते
जीर्ण वसन से झांक -झांक कर
कोई कुमुदिनी गदरायी सी
यौवन की मदिरा छलकी सी
उन्हें कभी खुश जो कर देती
पा जाती है कुछ कौड़ी तो
शिशु जनती-पालन भी करती
STREET_CHILDREN_19307f
(फोटो गूगल/नेट से साभार लिया गया)

‘प्रस्तर’ करती काल – क्रूर से
लड़-भिड़ कल ‘संसार’ रचेंगे
समता होगी ममता होगी
भूख – नहीं- व्याकुलता होगी
लेकिन ‘प्रस्तर’ काल बने ये
बड़े नुकीले छाती गड़ते
आँखों में रोड़े सा चुभ – चुभ
निशि -दिन बड़ा रुलाया करते
दूर हुए महलों में बस कर
भूल गए – माँ – का बलि होना
रोना-भूखा सोना – सारा बना खिलौना
कितने अच्छे लोग हमारे
नहीं टूट पड़ते ‘महलों’ में
ये ‘दधीचि’ की हड्डी से हैं
इनकी ‘काट’ नहीं है कोई
जो ‘टिड्डी’ से टूट पड़ें तो
नहीं ‘सुरक्षित’ – बचे न कोई
नमन तुम्हे है हे ! ‘कंकालों’
पुआ – मलाई वे खाते हैं
‘जूठन’ कब तक तुम खाओगे ??
कितनी ‘व्यथा’ भरे जाओगे ??
फट जाएगी ‘छाती’ तेरी
‘दावानल’ कल फूट पड़ेगा
अभी जला लो – झुलसा लो कुछ
काहे सब कल राख करोगे ?
अश्रु गिरा कुछ अभी मना लो
प्रलय बने कल ‘काल’ बनोगे ??
——————————————-
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल ‘भ्रमर ‘५
४-४.४५ मध्याह्न
३१.५.२०१२ कुल्लू यच पी



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35 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rekhafbd के द्वारा
July 5, 2012

सुरेन्द्र जी अभी जला लो – झुलसा लो कुछ काहे सब कल राख करोगे ? अश्रु गिरा कुछ अभी मना लो प्रलय बने कल ‘काल’ बनोगे ??,विचारणीय रचना

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    July 6, 2012

    रेखा जी रचना कुछ विचार करने को प्रेरित कर सकी सुन ख़ुशी हुयी …आभार भ्रमर 5 भ्रमर का दर्द और दर्पण

shashibhushan1959 के द्वारा
July 4, 2012

आदरणीय भ्रमर जी, सादर ! “”कोई कुमुदिनी गदरायी सी यौवन की मदिरा छलकी सी उन्हें कभी खुश जो कर देती पा जाती है कुछ कौड़ी तो शिशु जनती-पालन भी करती”" कटु सत्य ! डरावना ! क्या यही इनकी नियति है ! दबे-कुचले लोगों के जीवन की भयानक सच्चाई ! कब सुघरेगा ये सब ? देर से पहुचने के लिए क्षमा !

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    July 4, 2012

    प्रिय शशि भाई देर आये दुरुस्त आये आप के न रहने से आनंद कहाँ आता है …रचना पसंद आयी और लाचारी का फायदा उठाते लोगों को आप ने समझा देखा ख़ुशी हुयी … न जाने हमारा समाज कभी सुधरेगा की नहीं  प्रभु ही जाने …जय श्री राधे भ्रमर ५

    Santosh Kumar के द्वारा
    July 5, 2012

    आदरणीय भ्रमर जी ,.सादर प्रणाम देर से आने के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ ,..आपके भावों को नमन करने के अलावा कोई शब्द नहीं सूझ रहे हैं ,..आपकी ही एक बात याद आती है ,..इन कंकालों में है ताकत -एक आह भरें सब लौह भसम….एक दिन दरिद्र नारायण की आह इन लोहे के दिलों वाले लुटेरों को भस्म करेगी ,…सादर अभिनन्दन

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    July 6, 2012

    प्रिय संतोष भाई बिलकुल सत्य कब तक बकरे की माँ खैर मनाएगी एक न एक दिन वो कहावत इनके लिए चरितार्थ हो जाएगी ..वो दिन जरुर आएगा आइये बढ़ते चलें … आभार भ्रमर ५

ANAND PRAVIN के द्वारा
July 2, 2012

आदरणीय भ्रमर सर, सादर प्रणाम बहुत दिनों बाद मंच पर आया सर आपकी रचना पढ़ने कि इक्षा हुई आपकी रचना को पढ़ कुछ क्या कहूँ एक दर्द है जिसे आपने खूबसूरती से व्यंग का आँचल डाल हमारे बिच रख दिया है …………..खूबसूरती से लिखी गई रचना हर ओर से सोचने को मजबूर करती है आपको नमन सर आशीर्वाद बनाय रखें

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    July 4, 2012

    प्रिय आनंद जी बड़े चिंता की विषय है ये दर्द न जाने क्यों हमारे सभ्य समाज को नहीं दिखता ..अपने को विकाश शील कहते शर्म आती है एक तरफ ये लाचारी और भुखमरी दूसरी तरफ रोज ने केश और जेल कचहरी भरे रहने को देख मन खिन्न हो जाता है …आभार प्रोत्साहन हेतु भ्रमर ५

June 30, 2012

सदर प्रणाम! नहीं टूट पड़ते ‘महलों’ में ये ‘दधीचि’ की हड्डी से हैं इनकी ‘काट’ नहीं है कोई जो ‘टिड्डी’ से टूट पड़ें तो नहीं ‘सुरक्षित’ – बचे न कोई नमन तुम्हे है हे ! ‘कंकालों’ पुआ – मलाई वे खाते हैं ‘जूठन’ कब तक तुम खाओगे ?? कितनी ‘व्यथा’ भरे जाओगे ?? फट जाएगी ‘छाती’ तेरी ‘दावानल’ कल फूट पड़ेगा अभी जला लो – झुलसा लो कुछ काहे सब कल राख करोगे ? अश्रु गिरा कुछ अभी मना लो प्रलय बने कल ‘काल’ बनोगे ??…………आने वाले भविष्य के प्रति सावधान करती पक्तियां………..!

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    June 30, 2012

    धन्यवाद और आभार अनिल ‘आलीन’ जी बिलकुल ठीक कहा आप ने ……………आने वाले भविष्य के प्रति सावधान करती पक्तियां………..!..जब किसी चीज की अति होती है तो आक्रोश सम्हाले नहीं सम्हलता जैसे बाँध तोड़ कर छूटा पानी …. अभी से लोग जागें काश …….. भ्रमर ५

anujdiwakar26 के द्वारा
June 29, 2012

बहुत ही सुन्दर एवं भावपूर्ण रचना..!!!!

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    June 29, 2012

    प्रिय अनुज जी स्वागत है आप का यहाँ पर रचना भावपूर्ण और अच्छी लगी आप के मन को सुन सुख हुआ आभार भ्रमर ५

yogi sarswat के द्वारा
June 29, 2012

अभी जला लो – झुलसा लो कुछ काहे सब कल राख करोगे ? अश्रु गिरा कुछ अभी मना लो प्रलय बने कल ‘काल’ बनोगे ?? समाज और इंसान की अवस्था का मर्मस्पर्शी वर्णन ! बहुत सुन्दर ! आदरणीय शुक्ल जी भ्रमर साब , आपकी लेखनी में जादू है !

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    June 29, 2012

    प्रिय योगी जी ये विषमता बहुत कचोटती है मन को न जाने क्यों प्रभु पैसे वालों के दिल नहीं दिए आँखें नहीं दिए की वे ये सब व्यथा देख कर कुछ करें ये तो आप की महानता है गुरु जी की इस काविल समझे भ्रमर ५

alkargupta1 के द्वारा
June 29, 2012

शुक्ला जी , मर्मस्पर्शी भावपूर्ण रचना को पढ़ कर हृदय व्यथित सा हो गया आपकी रचनाएँ समाज की सच्ची तस्वीर के दर्शन कराती है….बधाई

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    June 29, 2012

    आदरणीया अलका जी ये व्यथा बढती ही जा रही है समाज में जितना हम विकसित हो रहें हैं उतना ही ..आभार आप का इस के मर्म को समझने हेतु काश लोग कुछ विषमता दूर करें आभार भ्रमर ५

Punita Jain के द्वारा
June 28, 2012

आदरणीय शुक्ला जी, आपने लोगो के दर्द को महसूस करके उसे इस रचना के माध्यम से व्यक्त किया | काश सब लोग इनके कष्टों को समझ पाते| आज भारत में आधी से अधिक जनसंख्या इसी तरह की जिन्दगी जीने को मजबूर हैं |

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    June 28, 2012

    पुनीता जी जय श्री राधे बहुत सुन्दर प्रतिक्रिया आप की …काश आप सा ही ही हमारे सभी भाई बहन युवा वर्ग इस पर गौर करें और अपने हक़ के लिए लडाई लड़ने को तैयार रहें जो खून उनका विषैला हो चूका है वो जाने में काफी वक्त लगेगा हमें उनको पवित्र करने की अभी से ठान लेनी चाहिए तब बात बनेगी .. आभार आप का भ्रमर ५

surendr shukl bhramar5 के द्वारा
June 28, 2012

प्रिय अशोक भाई सच कहा आप ने कलयुग को और शबाब पर चढ़ाएंगे ये देखना हमारी मजबूरी होगी अति होगी तब जा के विनाश ….आइये कुछ धनात्मक दिशा में आशा रखे बढ़ें … भ्रमर ५

vinitashukla के द्वारा
June 28, 2012

बहुत मार्मिक एवं भावयुक्त रचना. बधाई भ्रमर जी.

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    June 28, 2012

    आदरणीया विनीता जी इस रचना में दर्द और मर्म झलका आप ने वेदना महसूस किया काश महलों वाले भी महसूस करें और अभी जाग जाएँ …आभार भ्रमर ५

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
June 28, 2012

नहीं टूट पड़ते ‘महलों’ में ये ‘दधीचि’ की हड्डी से हैं इनकी ‘काट’ नहीं है कोई जो ‘टिड्डी’ से टूट पड़ें तो नहीं ‘सुरक्षित’ – बचे न कोई धन्य धन्य , बधाई,

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    June 28, 2012

    आदरणीय कुशवाहा जी ये व्यथा और आक्रोश आप के मन को छू सका सुन ख़ुशी हुयी काश हमारे लोग अपने अपने स्तर पर इस बात पर गौर करें …कल यहाँ भी बर्बादी न शुरू हो कुछ विषमता दूर करें अभी से तो सुन्दर … भ्रमर ५

yamunapathak के द्वारा
June 28, 2012

कितने अच्छे लोग हमारे नहीं टूट पड़ते ‘महलों’ में ये ‘दधीचि’ की हड्डी से हैं इनकी ‘काट’ नहीं है कोई वेदना के साथ व्यंग का पुट बहुत विदारक है भ्रमरजी और एक बात कहानी थी आपकी प्रतिक्रियाएं (मेरे पोस्ट पर)स्पं में चली जा रही हैं मैंने कल स दोनों प्रतिक्रियाएं पढी.आपका बहुत-बहुत आभार.

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    June 28, 2012

    धन्यवाद यमुना जी एक तो समयाभाव और फिर प्रतिक्रियाएं नहीं जाती तो मन खिन्न हो जाता है, बाकी सब पर तो प्रतिक्रिया जा रही हैं कुछ या तो माद रेशन सक्षम किये होंगे कुछ पर स्पैम …बीच बीच में स्पैम चेक कर लेना ठीक रहता है अच्छा हुआ आप ने देखा ..आभार ये वेदना सच में यमुना जी दिल को बहुत परेशां करती है इतना बढ़िया बाजार है ये भारत देश और यहाँ हमारे कुछ लोग भूखें मरते हैं कैसे लगता है आक्रोश फूटेगा कभी जोर शोर से … भ्रमर ५

jlsingh के द्वारा
June 27, 2012

फट जाएगी ‘छाती’ तेरी ‘दावानल’ कल फूट पड़ेगा अभी जला लो – झुलसा लो कुछ काहे सब कल राख करोगे ? अश्रु गिरा कुछ अभी मना लो प्रलय बने कल ‘काल’ बनोगे ?? कब समझेंगे भाग्य विधाता ? कुछ तो दे दो इनको दाता फोड़ न ले ये अपना माथा कब समझेंगे भाग्य विधाता भ्रमर जी, बहुत ही जीवंत चित्रण किया है आपने आज न कल आक्रोश तो फूटेगा ही ….

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    June 28, 2012

    प्रिय जवाहर जी सत्य वचन आप के अति की तरफ बढ़ रहे हैं भ्रष्टाचारी तो ये सब होना ही है कहीं करोडो रूपये कहीं दो रोटी भी नहीं …आभार आप का भ्रमर ५

dineshaastik के द्वारा
June 27, 2012

आदरणीय भ्रमर जी नमस्कार, व्यंग  प्रहार द्वारा क्राँति का आवाहन  करती हुई सुन्दर रचना की प्रस्तुति के लिये बधाई……

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    June 28, 2012

    प्रिय दिनेश जी आभार आप का… इस बार आप का समर्थन आसानी से मिला देख ख़ुशी हुयी ..काश क्रान्ति के पथ पर पहुँचने से पहले ही लोग कुछ समझ सोच बना लें तो अति सुन्दर …जय श्री राधे भ्रमर ५

akraktale के द्वारा
June 26, 2012

आदरणीय भ्रमर जी नमस्कार, अश्रु गिरा कुछ अभी मना लो प्रलय बने कल ‘काल’ बनोगे ?? क्या इतनी आसानी से बदल जाएगा सबकुछ, नहीं कलियुग अपने शबाब पर है और यही द्रश्य देखना हमारी मजबूरी. सुन्दर रचना. बधाई.

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    June 28, 2012

    प्रिय अशोक भाई सच कहा आप ने कलयुग को और शबाब पर चढ़ाएंगे ये देखना हमारी मजबूरी होगी अति होगी तब जा के विनाश ….आइये कुछ धनात्मक दिशा में आशा रखे बढ़ें … भ्रमर ५

Chandan rai के द्वारा
June 26, 2012

भ्रमर साहब , कितने अच्छे लोग हमारे भूखे-प्यासे -नंगे घूमें लिए कटोरा फिरें रात-दिन जीर्ण -शीर्ण – सपने पा जाएँ जूठन पा भी खुश हो जाते जीर्ण वसन से झांक -झांक कर कोई कुमुदिनी गदरायी सी बहुत सुन्दर रचना !

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    June 26, 2012

    चन्दन जी रचना आप को अच्छी लगी सुन हर्ष हुआ आभार भ्रमर ५

pritish1 के द्वारा
June 26, 2012

सुन्दर लेखन……..प्रभावित करती है…… मेरे ब्लॉग मैं सादर आमंत्रित हैं मेरी कहानी ऐसी ये कैसी तमन्ना है मैं अपने विचार व्यक्त करैं…. मैं इसका तीसरा भाग प्रस्तुत किया है,,,,, धन्यवाद……..!

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    June 26, 2012

    प्रतिष् जी अभिवादन है आप का यहाँ …ये रचना आप को प्रभावित कर सकी सुन ख़ुशी हुयी अपना प्रोत्साहन बनाये रखें भ्रमर ५


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