Bhramar ka 'Dard' aur 'Darpan'

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बूढा पेड़

Posted On: 24 Jul, 2012 Others में

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बूढा पेड़
झर-झर झरता
ये पेड़ (महुआ का )
कितना मन-मोहक था

orissa_11_20090326 mahua flowers

रस टपकता था
मिठास ही मिठास
गाँव भर में
‘भीड़’ जुटती
इसके तले
images (1)

‘बड़ा’ प्यारा पेड़
‘अपने’ के अलावा
पराये का भी
प्यार पाता था
हरियाता था
images (2)
images (3)

फूल-फल-तेल
त्यौहार
मनाता था
थम चुका है
अब वो सिल-सिला
बचा बस शिकवा -गिला
फूल-फल ना के बराबर
मन कचोटता है ……
आखिर ऐसा क्यों होता है ??
सूखा जा रहा है
पत्ते शाखाएं हरी हैं
‘कुछ’ कुल्हाड़िया थामे
जमा लोग हंसते-हंसाते
वही – ‘अपने’- ‘पराये’
काँपता है ख़ुशी भी
ऊर्जा देगा अभी भी
‘बीज’ कुछ जड़ें पकड़ लिए हैं
‘पेड़’ बनेंगे कल
फिर ‘मुझ’ सा
‘दर्द’ समझेंगे !
आँखें बंद कर
धरती माँ को गले लगाये
झर-झर नीर बहाए
चूमने लगा !!

आज हमारे वृद्धों की बहुत ही दयनीय दशा है जिस तरह से इस वृक्ष का दर्द उभरा जब तक वह फला फूला सारे उससे प्यार करते रहे अपने भी और पराये भी …लेकिन जब दिन बढे उम्र ढली फलने फूलने खिलाने भरण पोषण दूसरों को नहीं कर सका तो लोग उसे नकार कर धराशायी कर दिए ठीक उसी तरह है अंत के अपने दिन हैं जिस की खातिर लोग भागते रहे सब कुछ सह कर कमाते रहे भ्रष्टाचार करते रहे चोरियां भी की वही लोग इस तरह से मुंह फेर कर तरह तरह की बातें सुना कर दिल छलनी कर देते हैं दूर चले जाते हैं बुढ़ापे में कोई पानी तक देने वाला नहीं मिलता ….काश लोग इन्हें भरपूर प्यार दें ……………..
( सभी फोटो गूगल नेट से साभार लिया गया )

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल ‘भ्रमर’५
कुल्लू यच पी २५.६.१२
८-८.३३ पूर्वाह्न
ब्लागर- प्रतापगढ़ उ.प्र .



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39 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
August 1, 2012

रक्षा बंधन की हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई हमारे सभी प्रिय मित्रों को . .प्रभु से प्रार्थना है कि ये भाई बहन का पर्व यों ही सदा सदा के लिए अमर रहे प्रेम उमड़ता रहे और बहनों की सुरक्षा के लिए हम सब के मन में जोश द्विगुणित होता रहे … आइये बहनों को सदा खुश रखें हंसे हंसाएं प्रेम बरसायें …तो आनंद और आये … जय श्री राधे आप सब का ‘भ्रमर’५

rekhafbd के द्वारा
August 1, 2012

आदरनीय सुरेन्द्र जी , काँपता है ख़ुशी भी ऊर्जा देगा अभी भी ‘बीज’ कुछ जड़ें पकड़ लिए हैं ‘पेड़’ बनेंगे कल फिर ‘मुझ’ सा ‘दर्द’ समझेंगे !,अति सुंदर अभिव्यक्ति ,बधाई

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    August 1, 2012

    जी रेखा जी इन्ही पंक्तियों में सारा दर्द भरा है जो आज हमारा हाल है कल उनका भी वही होगा होने वाला है काश ये लोग समझें और बुढ़ापे को सहारा दें जय श्री राधे भ्रमर ५

seemakanwal के द्वारा
July 29, 2012

आदरणीय भ्रमर जी सादर नमस्कार .बहुत सुन्दर रचना हार्दिक धन्यवाद .काश हम पेड़ों का दर्द महसूस कर पाते .C

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    August 1, 2012

    जी सीमा जी दर्द तो जब आभास किया जाए कल्पना किया जाए तो महसूस हो ही जाता है लेकिन उस दर्द को महसूस कर के हम कुछ करें सुधरें तो आनंद और आये ये हमारे बुढ़ापे की दशा को इंगित कर रहा है … भ्रमर ५

minujha के द्वारा
July 29, 2012

पेङ के दर्द को बहुत भावुक शब्दों में पिरोया है आपने भ्रमर जी,बधाई

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    July 29, 2012

    मीनू जी अभिवादन …आभार आप का ..पेड़ के बहाने बुढ़ापे का दर्द रचना उभार सकी आप को अच्छा लगा सुन ख़ुशी हुई आभार भ्रमर ५

yogi sarswat के द्वारा
July 26, 2012

फूल-फल-तेल त्यौहार मनाता था थम चुका है अब वो सिल-सिला बचा बस शिकवा -गिला बहुत सुन्दर , सन्देश देती हुई रचना ! भ्रमर साब बधाई

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    July 27, 2012

    प्रिय योगी जी रचना मानवीकरण द्वारा बुढ़ापे का दर्द कुछ दिखला सकी और आप के मन को छू पायी सुन ख़ुशी हुई आभार भ्रमर ५

dineshaastik के द्वारा
July 26, 2012

आदरणीय भ्रमर जी, चित्रों को मनमोहक रूप में  चित्रित करने एवं सुन्दर संदेश देती हुई रचना की प्रस्तुति के लिये बधाई……

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    July 27, 2012

    प्रिय दिनेश भाई महुवा के प्यारे चित्र मन मोहे आप का और सब याद आया होगा सुन ख़ुशी हुयी आभार भ्रमर ५

Rajkamal Sharma के द्वारा
July 26, 2012

आदरणीय भरमार जी …..सादर प्रणाम ! दुःख तो इस बात का है की वनों के अंधाधुंध कटान की वजह से बहुत से प्रकार के पेडों की तो प्रजातिया विलुप्त प्राय भी हो चुकी है ….. पिछले हफ्ते ही पढ़ा था की च्वयनप्राश के अष्टवर्ग की ज्यादातर बूटियों समेत अधिकाँश जड़ी बुटिया खत्म हो चुकी है ….. कई ओ का विकल्प है तो बाकी के बिना ही काम चलाया जा रहा है और जो विकल्प है उन पर भी इतना ज्यादा भार पड़ गया है की उनकी प्रजातियो पर भी समाप्ति का खतरा मोजूद है ….. जय श्री राधेश्याम

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    July 27, 2012

    हाँ राज भाई सब कुछ विलुप्त ही होता जा रहा है अंधाधुंध जहां फायदा दिखाई दिया वहीं लोग जुट जाते हैं आगे पीछे कौन सोचता है और हाल बदतर दिन प्रतिदिन ….मानव जाति को बचायियेगा प्रभु चिंता का सबब है वनस्पतियों जड़ी बूटियों का जाना …. आभार भ्रमर ५

Rajkamal Sharma के द्वारा
July 26, 2012

आदरणीय भरमार जी ….. सदर प्रणाम ! आपसे एक पोस्ट तो मदनमोहन जी पर बनती ही है इतना तो हमारा हक बनता ही है ….. पिछली बार जब अन्ना जी का आंदोलन अपने चरम पर था तब कुछ उम्मीद की किरण जगी थी देखना होगा की इस बार हालात में किस प्रकार का परिवर्तन आता है …. उम्मीद करनी चाहिए की सभी शुभ ही होगा हार्दिक आभारी हूँ आपका

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    July 27, 2012

    जी सब शुभ होगा और कुछ न कुछ कान्हा जी आप के मन मोहन चाहेगे तो लिख भी उठेगा आप बोलें और कौन न माने ?? उम्मीद करनी चाहिए की सभी शुभ ही होगा उम्मीदों पर दुनिया टिकी है जय श्री राधे राज भ्राता जी भ्रमर ५

shashibhushan1959 के द्वारा
July 26, 2012

आदरणीय भ्रमर जी, सादर ! इस महुए के पेड़ का दर्द केवल उसका दर्द नहीं बल्कि तमाम प्राचीन धरोहरों का दर्द है ! आधुनिकता कि दौड़ में इनका अस्तित्व ही खतरे में है ! बचपन में छुट्टियों में जब हम गाँव जाते थे तो मुंह अँधेरे ही डलिया लेकर महुआ बीनने जाते थे ! पहले दुसरे के पेड़ों के नीचे का बीनते थे, फिर अपने पेड़ के नीचे का ! क्या दिन थे वो ? पेड़ों के नाम होते थे ! उसी नाम से उन्हें पुकारा जाता था ! एक आत्मीयता होती थी ! वो बातें, वो परिवेश अब कहाँ ? सादर !

    jlsingh के द्वारा
    July 27, 2012

    प्रणाम सर, इसका मतलब आप बचपन में खूब शरारती थे “पहले दुसरे के पेड़ों के नीचे का बीनते थे, फिर अपने पेड़ के नीचे का ! क्या दिन थे वो ?” मजा आ गया!… हमलोग तो महुआ को चूरकर उसका रस भी पीते थे. महुआ का लड्डू तीसी मिलाकर माँ बनाती थी, पर थोडा ही खाने देती थी … तब क्या पता था कि महुआ से शराब भी बनती है और बहुत नशीला होता है! भ्रमर जी बहुत ही बारीक नजर रखते हैं!

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    July 27, 2012

    हाँ जी जवाहर भाई भ्रमर ही हैं तो कली फूल महुवा देशी …सब का ख्याल रखना होता है ….शशि भाई ने कितना प्यारा सच बोला दूसरों की डाल के पेड़ के थाली के ..बड़े प्यारे तो लगते ही हैं न …हमारे यहाँ देशी कहावत है आन के पतरी के लम्बा लम्बा भात ..आभार भ्रमर ५

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    July 27, 2012

    प्रिय शशि भाई सच का सामना में आप होते तो कुछ करोड़ लाख जीत ही आते ह हा देखिये न जवाहर भाई ने क्या चुटकी ली …सच है बहुत आनंद आता ही था वचपन के दिन भी क्या दिन थे … प्रोत्साहन के लिए आभार भ्रमर ५

akraktale के द्वारा
July 25, 2012

भ्रमर जी सादर, सुन्दर रचना बधाई.

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    July 29, 2012

    प्रिय अशोक भाई रचना पेड़ के बहाने हमारे बुढ़ापेपन की स्थिति और व्यथा को दर्शा सकी और आप के मन को भाई सुन ख़ुशी हुयी आभार भ्रमर ५

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
July 25, 2012

aur phir mahue ke poorn vriksh ban ve beej vatavaran men phailayenge apnee madakta ! bhramar jee, ati sundar prastuti ke liye hardik aabhar !saabhivadan!

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    July 25, 2012

    आदरणीय आचार्य जी मादकता के साथ साथ रस भी प्रदान करते हैं ये ..कुछ लोग नशे में तो कुछ रस से भाव बिभोर हो त्यौहार सा पकवान और पूड़ी का आनंद ..जो जैसा चाहे वैसा देखे और पाए … रचना आप के मन को छू सकी सुन ख़ुशी हुयी आभार भ्रमर ५

vinitashukla के द्वारा
July 25, 2012

सुन्दर व सचित्र प्रस्तुतिकरण. बधाई भ्रमर जी.

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    July 25, 2012

    आदरणीया विनीता जी रचना आप के मन को छू सकी और इस बुढ़ापे का दर्द आप ने समझा सराहा सुन अच्छा लगा काश बूढ़े को दर्द न दें भ्रमर ५

yamunapathak के द्वारा
July 25, 2012

बहुत सुन्दर भ्रमर जी, नयी पीढी के शहरी परिवेश में पले आज की पीढी तो महुआ शब्द ही नहीं जानती उसकी महक तो बहुत दूर की बात है.पर मुझे आज भी उसकी खुशबू याद आती है.

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    July 25, 2012

    आदरणीया यमुना जी इस रचना ने आप को पुरानी यादों से जोड़ा बड़ी ख़ुशी हुयी एक तरफ जैसा सुमित जी ने कहा की महुवा का पेड़ उन्होंने देखा ही नहीं सोचिये आज के पीढ़ी की स्थिति चिंता का सबब है एक हम सब थे आम जामुन महुवा के व्यंजन खाते ऊब जाते थे ….. आभार भ्रमर ५

Sumit के द्वारा
July 25, 2012

सुंदर रचना …..परन्तु इन चित्रों ने तो मन मोह लिया ..मैंने कभी महुआ का पेड़ नही देखा, परन्तु इन चित्रों को देख के अब देखने का मन करता है …………… http://sumitnaithani23.jagranjunction.com/2012/07/24/चम्पू-का-प्रेम-पत्र/

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    July 25, 2012

    प्रिय सुमित जी बड़ी चिंता का विषय है हमारी आज की पीढ़ी के लिए ये सब ….क्या क्या हम अजायब घर में रखेंगे ..जैसे की आप ने कहा आपने महुवा के पेड़ के दर्शन नहीं किये ये देशी मेवा बोला जाता है रस से भरा मीठा इस के गुलगुले , लपसी , ठोकवा, बहुत प्यारे पकवान फिर तेल से इसके डालडा जैसा पूड़ी कचौड़ी आदि भी लोग बनाते हैं बहुत काम का है ..एक हम लोग थे देहात गाँव में हवा चलते ही आम , जामुन, महुवा, कोवा बीनते ऊब जाते थे ..भागते थे इस से और अब …. भ्रमर ५

VIVEK KUMAR SINGH के द्वारा
July 25, 2012

जय श्री राधे , आदरणीय भ्रमर ५ जी | बहुत ही बढ़िया भाव पूर्ण कविता लिखी है आपने और साथ में बहुत अच्छे चित्र भी दिए हैं |

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    July 25, 2012

    विवेक जी आभार बुदापे का दर्द आप ने भांपा और रचना आप के कोमल मन को छू सकी काश इससे लोग सबक लें और हमारे वृद्ध जन को भरपूर प्यार और सहारा दें उन्हें अंत तक खुश रखें .. भ्रमर ५

jlsingh के द्वारा
July 25, 2012

आदरणीय भ्रमर जी, सादर अभिवादन! आपने जो कहनी थी कह दी पर हमने जो कभी देखा था, आपने उन्हें टुकड़ों में दिखाया, बेहद ही खूबसूरत अंदाज में! आपका जवाब नहीं! आप तो शादी मत ही कीजिये. इसी तरह सुन्दरता को अंकित करते रहिये, मनमोहक अंदाज में!‘बीज’ कुछ जड़ें पकड़ लिए हैं ‘पेड़’ बनेंगे कल फिर ‘मुझ’ सा ‘दर्द’ समझेंगे ! आँखें बंद कर धरती माँ को गले लगाये झर-झर नीर बहाए! हमारा भी महुआ का पेड़ बूढ़ा हो चला है पर गर्मी में छाया और मादकता दोनों प्रदान करता है!

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    July 25, 2012

    प्रिय जवाहर भाई टुकड़े टुकड़े को जोड़ तक ही आप की भावना को उकेरा जा सकता है ..अच्छा लगा आप गाँव की याद किये हमारे तो एक दो बूढ़े महुए हिस्सेदारी वाले जा चुके हैं यादें ही बाक़ी हैं दर्द तो होता है लेकिन कभी गाँव में किसी की मजबूरी क्रिया कर्म आदि में ये खुद को न्योछावर कर गए ….वैसे इस में पेड़ से मानवीकरण है हमारे बुढ़ापे का दर्द छुपा है आशा है आप ने देखा होगा ….आभार भ्रमर ५

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
July 24, 2012

मेरा दर्द न जाने कोय महुआ देख कर मोह गया मन जालिम कुल्हाड़ी ने काटा तन बचे बीजों को साथियों जमने दो हरे पेड़ों से धरा को सजने दो बधाई. आदरणीय भ्रमर जी, सादर अभिवादन के साथ बधाई.

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    July 24, 2012

    आदरणीय कुशवाहा जी ..इस रचना ने आप को गाँव का सैर कराया और दर्द बुढ़ापे का आप ने महसूस किया ..सुन ख़ुशी हुयी लिखना सार्थक रहा आभार भ्रमर ५

Mohinder Kumar के द्वारा
July 24, 2012

शुक्ला जी पेडों की बदौलत ही यह धरती इतनी सुन्दर और हरी भरी है…इनके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती. इस भाव भरी रचना के लिये बधाई.

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    July 24, 2012

    बिलकुल सत्य उदगार आप के मोहिंदर भाई जी पेड़ों के बिना जीना ही नहीं हो सकता सारा पर्यावरण तो इस पर ही टिका हुआ है हमारा ..यहाँ हमारे पेड़ से बूढों की वेदना तक का भाव है … आप की बधाई सर आँखों पर आभार भ्रमर ५

vikaskumar के द्वारा
July 24, 2012

तस्वीरों के साथ छपी एक सुंदर कविता । कविता में दार्शनिकता है ,जो कलात्नकता के साथ प्रस्तुत है ।

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    July 24, 2012

    प्रिय विकास जी अभिवादन और अभिनन्दन आप का ..बिलकुल सच कहा आप ने .. कविता में दार्शनिकता है ,जो कलात्नकता के साथ प्रस्तुत है ..रचना आप को अच्छी लगी सुन ख़ुशी हुयी काश लोग आप की नज़रों से ही देखें इसे …मानवीकरण है ..हमारे वृद्ध जन का दर्द और मर्म है … आभार भ्रमर ५


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