Bhramar ka 'Dard' aur 'Darpan'

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होंठों पर यूं -हंसी खिली हो

Posted On: 5 Dec, 2013 Others,social issues,कविता में

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आओ देखें कविता अपनी
रंग-बिरंगी -सजी हुयी -है
कितनी प्यारी -
मुझको -तुमको लगता ऐसे …

जैसे भ्रमर की कोई
कली खिली हो
भर पराग से उमड़ पड़ी हो
तितली के संग -
खेल रही हो मन का खेल !!

चातक की चंदा
निकली हो आज -
पूर्णिमा-धवल चांदनी
धीरे -धीरे आसमान में
सरक रही हो
पास में आती
मोह रही हो सब का मन !!

बिजली ज्यों बादल का दामन
छू-आलिंगन कर
चमक पड़ी हो
“बादल” खुश हो -
गरज पड़ा हो
बरस पड़ा हो
“मोर”- सुहावन
देख नजारा-”ये” -
मनभावन
नाच पड़ा हो
लूट लिया हो सब का मन !!

फटे -पुराने कपडे पाए
“वो”-अनाथ ज्यों
झूम पड़ा हो
चूम लिया हो
हहर उठा हो उसका मन !!!

रोटी के संग -
गुड़ पाए ज्यों -एक भिखारी
भूखा-प्यासा
तृप्त हुआ हो
होंठों पर यूं -हंसी खिली हो
धन्यवाद देता -जाये- मन !!!

भ्रष्टाचारी मूर्ख बनाये
जनता को ज्यों
“वोट” बटोरे
सिंहासन -आसीन हुआ हो
लूट लिया हो
वो “कुबेर’ बन -
स्वर्ग गया हो
भूल गया हो -
अहं भरा ‘तांडव’ करता हो
देख “अप्सरा”-
फूल गया हो उसका मन !!

तपे “जेठ”-जब सूखा झेले
मुरझाये “वो” -कहीं पड़ा हो
खेत -बाग़-वन !!
उमड़ -घुमड़ ज्यों देखे बदरा
लोट-लोट जाये -किसान ‘मन’ !!

कवि कोई ज्यों ‘सुवरन ‘देखे
खिंचा चला हो >>
अंग-अंग को उसके देखे
उलट पलट के -जाँच रहा हो
चूम रहा – सौ बार !!

दुल्हन जैसे खड़ी हुयी हो
नयी नवेली – बनी पहेली
कर सोलह श्रृंगार !!
करे – अलंकृत –
“गजरा” लाये – फूल सजाये
रंग लगाए
सराबोर हो -
भंग का जैसे नशा चढ़ा हो
हँसता जाए –
कविता – देखे
बौराया हो ‘फागुन” में मन !!!

सुरेन्द्रशुक्लाभ्रमर५
१०.३.२०११ जल पी बी

दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं



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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

meenakshi के द्वारा
February 8, 2014

“बौराया हो ‘फागुन” में मन !!!” बहुत सुंदर काव्य रचना . मीनाक्षी श्रीवास्तव

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    February 12, 2014

    आदरणीया मीनाक्षी जी बहुत बहुत आभार प्रोत्साहन हेतु ..रचना आप के मन को छू सकी सुन हर्ष हुआ भ्रमर ५

harirawat के द्वारा
December 19, 2013

मन की गहराइयों तक छूने वाली कविता भ्रमर जी ! भवंर की तरह रंगीन रस भरे खूशबूदार फूलों की फँखड़ियों से झूला झूलना और रस लेना आपकी कविता की विशेषता है ! ज़रा नजर िाधर भी इनायत कीजिए ! हरेन्द्र जागते रहो !

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    February 8, 2014

    जय श्री राधे आदरणीय हरेन्द्र जी आप के शब्द फूलों से झर झर जब झरने लगते हैं तो अति आनंद आता है महकाते रहिये यों ही चमन और अपने वतन को .. भ्रमर ५

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
December 8, 2013

मुक्त-छंद ऐसे कि जैसे मूर्त रूप गह रहा हो ! बहुत-बहुत बधाई भाई ! पुनश्च ! ज्यादा चर्चित स्तम्भ में ‘ प्रतीक्षा” अवश्य पढ़ें !

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    February 8, 2014

    आदरणीय आचार्य जी मुक्त छंद आप के मन को छु सके और आप का प्रोत्साहन मिला ख़ुशी हुयी आभार प्रतीक्षा अवश्य पढ़ेंगे \ भ्रमर ५

December 6, 2013

सादर प्रणाम, भैया! बहुत दिनों बाद दर्शन हुए …..संभवतः मैं ही बहुत दिनों बाद आया ……………………. उमड़ -घुमड़ ज्यों देखे बदरा लोट-लोट जाये -किसान ‘मन’ !! कवि कोई ज्यों ‘सुवरन ‘देखे खिंचा चला हो >> अंग-अंग को उसके देखे उलट पलट के -जाँच रहा हो चूम रहा – सौ बार !! दुल्हन जैसे खड़ी हुयी हो नयी नवेली – बनी पहेली कर सोलह श्रृंगार !! ……………….सुन्दर………………..

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    December 6, 2013

    भैया अनिल जी जय श्री राधे अच्छा लगा आप पधारे बहुत दिनों बाद …कुछ पंक्तियाँ आप के मन को भायीं आप ने रचना के प्रकृति और श्रृंगार चित्रण को सराहा आनंद आया …आभार व्यस्तता वश देर से आप सब के दर्शन हुए भ्रमर ५

ANAND PRAVIN के द्वारा
December 5, 2013

आदरणीय भ्रमर सर, सादर प्रणाम आपकी लिखी इतनी मधुर होती है सर कि मानो मखमल पर चलते जाएं और पता ही ना लगे रास्ता कैसे कट गया………..बहुत सुन्दर कविता सर

    December 6, 2013

    मित्रवर ज्यादा मखमल पर मत चलिए………………….कहीं पैर फिसला तो नाक मुंह बराबर हो जायेगा………..

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    December 6, 2013

    प्रिय प्रवीण जी रचना को आप ने सराहा मान दिया बहुत अच्छा लगा आप अपने मित्र अलीन की बातों पर मत जाइयेगा यहाँ मखमल पर कोई फिसलने वाला नहीं और कोई फिसला भी तो मखमल ही है चहुँ और पत्थर नहीं तो किसी तरह का कोई खतरा नहीं गिरना संहलना वैसे भी जीवन में बहुत जरुरी है … भ्रमर ५

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    December 6, 2013

    प्रिय अनिल जी लगता है दोस्ती बहुत ही प्रगाढ़ है इस लिए जहां मिले वहीं शुरू हो गए अपने प्रिय मित्र से ……जय श्री राधे भ्रमर ५

    December 7, 2013

    बहुत पुरानी दोस्ती है…………….बाबा आदम के ज़माने की …………….इसीलिए कभी-कभी दुश्मनी सी लगाती है……………सच तो यह भी है कि समय-समय पर इनका टांग खींचना जरुरी हो जाता है वरना यह दूसरों की खिंचाई नहीं करने देंगे मुझे………….हाँ………….हाँ…………..सादर आभार..भैया…………


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