Bhramar ka 'Dard' aur 'Darpan'

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मै पिजड़े का तोता हूँ

Posted On: 26 Mar, 2014 कविता में

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(फ़ोटो साभार गूगल / नेट से )

मै पिजड़े का तोता हूँ
इधर से उधर
उधर से इधर
फुर्र -फुर्र उड़ता हूँ
चलता हूँ -घूमता हूँ
कसरत करता हूँ
उल्टा लटकता हूँ
सर्कस सा
मीठा-मीठा मिट्ठू -मिट्ठू
बोलता हूँ -बुलाता हूँ
‘कुछ ‘ हैं अपने
समझते हैं मेरी भाषा
बोलते हैं मुझसे
बड़ा प्यारा लगता है
मै न्योछावर
अपनी गर्दन तक
दे देता हूँ
उनके हाथों में
मेरी मेहनत पे वे
डाल देते हैं कुछ दाना
खाना-पानी
और ‘कुछ’ तीखी मिर्ची
बड़ा प्रेम है -मुझे -
‘अपनों से ‘
ये मेरे ‘कुछ अपने ‘
दूजे को देख चाँव -चाँव कर
भगा देता हूँ
चाहे मेरे माँ-बाप, सगे हों
चीखता हूँ -चिल्लाता हूँ
बड़ा मजा आता है
तब-मेर ‘अपनों ‘ को
कभी मेरे ‘अपनों’ का
मेरी तरफ
बढ़ता हाथ देख
न जाने क्यूँ ?
बड़ा डर लगता है
‘अपनों ‘ से ही
चाँव-चाँव चीखता हूँ
फड़फड़ाता हूँ
मन कहता है उड़ जाऊं
कहीं दूर गगन में
‘पर’ लगता है
‘पर’ क़तर गए हैं
‘वे’ नोंच न खाएं
अजीब दुनिया है
कौन है मेरा ??
मन मसोस कर रह जाता हूँ
फिर वही उछल-कूद
कसरत , पिजड़े में कैद
मिट्ठू -मिट्ठू -मीठा मीठा
बोलने लगता हूँ
——————————–
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल ‘भ्रमर ‘५
४.१०-४.४० मध्याह्न
करतारपुर -जालंधर पंजाब



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16 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pkdubey के द्वारा
May 29, 2014

सब पर कमेंट लिख पाना तो कठिन है,पर आप की रचना को पढ़ने में बहुत अच्छा लगता सर.

    surendra shukl bhramar5 के द्वारा
    June 9, 2014

    प्रिय दुबे जी आभार आप का जितना सम्भव हो सके अपना सुझाव मार्ग दर्शन देते रहिये पढ़ना ही हो जाए तो बहुत अच्छा भ्रमर ५

kavita1980 के द्वारा
April 2, 2014

http://kavita1980.jagranjunction.com/2014/03/25/परिभाषाएं/

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    April 8, 2014

    कविता जी धन्यवाद जानकारी के लिए हम अवश्य इस पोस्ट पर आयेंगे आभार भ्रमर ५

kavita1980 के द्वारा
April 2, 2014

बेहतरीन प्रस्तुति भ्रमर जी- -हम सभी हैं कैद ,बंद अपने अपने पिंजरों में ,दायरों में ; व्याकुल होता है मन कभी कभी- रिश्तों की तेज आंच से, छांव बन जाती हैं तब शब्दों की बदलियाँ , बरस के कविता के रूप में, नम कर जाती हैं मौसम -और फुहारें फिर जीवन की –जीने का संदेश देती हैं

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    April 2, 2014

    कविता जी बहुत सुन्दर शब्द आप के मनोहर …रचना कि प्रस्तुति आप के मन को छू सकी सुन ख़ुशी हुयी आभार भ्रमर ५

    shuklabhramar5 के द्वारा
    March 31, 2014

    प्रिय योगी जी जय श्री राधे रचना के उपर्युक्त शब्द आप के मन को छूने में कामयाब रहे सुन हर्ष हुआ लिखना सार्थक रहा आभार भ्रमर ५

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
March 26, 2014

sarthak rachna hetu aabhar

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    March 27, 2014

    आदरणीया डॉ शिखा जी प्रोत्साहन हेतु बहुत बहुत आभार भ्रमर ५

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 26, 2014

आज हर व्यक्ति की ज़िन्दगी एसी ही माया मोह की विवशताओं के पिंजरे में कैद है,वह चाह कर भी नहीं आज़ाद हो सकता ,बहुत उम्दा कविता सुरेन्द्रजी ,हार्दिक बधाई .

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    March 27, 2014

    आदरणीया निर्मला जी स्वागत है आप का यहाँ …और आभार प्रोत्साहन के लिए बहुत सच्ची बात कही आप ने आज हर व्यक्ति की ज़िन्दगी एसी ही माया मोह की विवशताओं के पिंजरे में कैद है,वह चाह कर भी नहीं आज़ाद हो सकता भ्रमर५

nishamittal के द्वारा
March 26, 2014

सुन्दर अभिव्यक्ति शुक्ल जी

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    March 27, 2014

    आदरणीया निशा जी रचना कि अभिव्यक्ति ने आप के मन को छुआ सुन हर्ष हुआ आभार भ्रमर ५

Ramesh Bajpai के द्वारा
March 26, 2014

प्रिय श्री शुक्ल जी फड़फड़ाता हूँ मन कहता है उड़ जाऊं कहीं दूर गगन में ‘पर’ लगता है ‘पर’ क़तर गए हैं” यह व्याकुलता आजादी के लिए है पर उन्मुकत उड़न में संसय है | यही जीवन में भी होता है | कल्पनाओ के पंखो पर उड़ना अलग है .यथार्थ में अलग | बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति |

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    March 27, 2014

    कल्पनाओ के पंखो पर उड़ना अलग है .यथार्थ में अलग | बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति | आदरणीय बाजपेयी जी बिलकुल यथार्थ कहा आप ने मन तो मन ही है न आजाद तो रहना ही चाहता है पर काश आजादी … भ्रमर ५


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