Bhramar ka 'Dard' aur 'Darpan'

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कनक कनक रम बौराया जग

Posted On: 31 Mar, 2014 कविता में

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किसको किसको मै समझाऊँ

ये जग प्यारे रैन बसेरा

सुबह जगे बस भटके जाना

ठाँव नहीं, क्या तेरा-मेरा ??

आंधी तूफाँ धूल बहुत है

सब है नजर का फेरा

खोल सके कुछ चक्षु वो देखे

पञ्च-तत्व बस, दो दिन मेला

——————————–

कनक कनक रम बौराया जग

भौतिक खेल-खेल में डूबा

पीतल चमक खरा सोना ना

बूझ पहेली पूरा-पूरा

हीरा कोयले में मिलता रे !

यह जग प्यारे बड़ा अजूबा

——————————–

सूरज ना धरती से निकले

नहीं समाये ये रे ! धरती

ललचाये ना -’देखा’ होता

सार-सार गहि तजि दे थोथा

खाद उर्वरक कर्म न डाले

क्या पायेगा वंजर धरती

————————–

कभी चांदनी कभी अँधेरा

सूखा वर्षा फटता बादल

रचा कभी पल मिट है जाता

देख ‘सूक्ष्म’ सत का हो कायल

कुदरत ने भेजा रचने को

जोश प्रेम से रच हे! पागल

—————————–

लोभ मोह ना करे संवरण

ईहा क्रोध राग अति घातक

शान्ति-त्याग जप जोग वरन कर

ऋणी ऋणात्मक काहे पातक ?

तू न्यारा तेरी रचना न्यारी

प्रिय बन जा रे ! मन कर पावन

———————————-

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५

६.२५ पूर्वाह्न -७.०० पूर्वाह्न

करतारपुर जालंधर पंजाब

४.०३.२०१४



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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
April 6, 2014

आदरणीय भ्रमर जी, सादर अभिवादन! काफी दिनों बाद आपके दर्शन हुए और अध्यात्म से ओतप्रोत रचना पढने को मिली/…. कभी चांदनी कभी अँधेरा सूखा वर्षा फटता बादल रचा कभी पल मिट है जाता देख ‘सूक्ष्म’ सत का हो कायल कुदरत ने भेजा रचने को जोश प्रेम से रच हे! पागल बहुत ही सुन्दर और सत्य भी!

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    April 7, 2014

    धन्यवाद जवाहर भाई ..आध्यात्मिक गुर वाली ये रचना आप के मन को भाई और आप ने सराहा बड़ी ख़ुशी हुयी अपना स्नेह बनाये रखें भ्रमर५

deepak pande के द्वारा
April 5, 2014

BAHUT KHOOB SANDESH SE BHARI RACHNA http://deepakbijnory.jagranjunction.com/2014/04/05/न्याय-भ्रष्टाचार-देव-का-प/

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    April 6, 2014

    दीपक जी रचना आप के मन को भाई सुन ख़ुशी हुयी आभार प्रोत्साहन हेतु bhramar5

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
April 1, 2014

शांति-त्याग ,जप जोग वरन कर ऋणी ऋणात्मक काहे पातक,उच्च जीवन दर्शन से लवरेज स्तरीय रचना,बहुत बधाई सुरेन्द्रजी .

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    April 3, 2014

    निर्मला जी रचना पर आप से प्रोत्साहन मिला बड़ी ख़ुशी हुयी आभार भ्रमर 5

March 31, 2014

कभी चांदनी कभी अँधेरा सूखा वर्षा फटता बादल रचा कभी पल मिट है जाता देख ‘सूक्ष्म’ सत का हो कायल कुदरत ने भेजा रचने को जोश प्रेम से रच हे! पागल बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति . .

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    April 3, 2014

    शालिनी जी प्रोत्साहन के लिए आभार रचना आप के मन को छू सकी लिखना सार्थक रहा भ्रमर ५

sanjay kumar garg के द्वारा
March 31, 2014

आदरणीय सुरेन्द्र जी, सादर नमन! सुन्दर, भक्ति रस में पगी कविता! बधाई!

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    April 3, 2014

    संजय जी सराहना के लिए आभार रचना भक्ति रस ले आप के मन को छू सकी सुन ख़ुशी हुयी भ्रमर ५


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