Bhramar ka 'Dard' aur 'Darpan'

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अश्क नैन ले -मोती रही बचाती

Posted On: 19 Jan, 2015 कविता में

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अश्क नैन ले -मोती रही बचाती

इठलाती -बलखाती
हरषाती-सरसाती
प्रेम लुटाती
कंटक -फूलों पे चलती
पथरीले राहों पे चल के
दौड़ी आती
तेरी ओर
“सागर” मेरे-तेरी खातिर
क्या -क्या ना मै कर जाती
नींद गंवाती -चैन लुटाती
घर आंगन से रिश्ता तोड़े
“अश्क” नैन ले
“मोती” तेरी रही बचाती
दिल क्या तेरे “ज्वार” नहीं है
प्रियतम की पहचान नहीं है
चाँद को कैसे भुला सके तू
है उफान तेरे अन्तर भी
शांत ह्रदय-क्यों पड़े वहीं हो ?
तोड़ रीति सब
बढ़ आओ
कुछ पग -तुम भी तो
बाँहे फैलाये
भर आगोश
एक हो जाओ
समय हाथ से
निकला जाए !!
———————-
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल “भ्रमर”५
८.३० पूर्वाह्न जल पी बी
०६.०८.२०११



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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pkdubey के द्वारा
January 22, 2015

आदरणीय अवश्य ही सागर बढ़ेगा ,सुनामी का रूप लेकर भी बढ़ सकता है ,बहुत सुब्दर ,सारगर्भित काव्य ,सादर आभार |

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    January 23, 2015

    प्रिय दुबे जी प्रियतमा के उदगार आप ने समझे और रचना आप को अच्छी लगी सुन ख़ुशी हुयी आभार भ्रमर ५

Shobha के द्वारा
January 20, 2015

श्री शुक्ल जी बेहद खूबसूरत भाव पूर्ण कविता डॉ शोभा

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    January 23, 2015

    आदरणीया शोभा जी

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    January 23, 2015

    आदरणीया शोभा जी रचना आप के मन को छू सकी सुन हर्ष हुआ प्रोत्साहन के लिए आभार भ्रमर ५


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