Bhramar ka 'Dard' aur 'Darpan'

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माँ लोट रही-चीखें क्रंदन बस यहां वहां

Posted On: 6 May, 2015 Others,social issues,कविता में

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माँ लोट रही-चीखें क्रंदन बस यहां वहां
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एक जोर बड़ी आवाज हुयी

जैसे विमान बादल गरजा

आया चक्कर मष्तिष्क उलझन

घुमरी-चक्कर जैसे वचपन

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अब प्राण घिरे लगता संकट

पग भाग चले इत उत झटपट

कुछ ईंट गिरी गिरते पत्थर

कुछ भवन धूल उड़ता चंदन

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माटी से माटी मिलने को

आतुर सबको झकझोर दिया

कुछ गले मिले कुछ रोते जो

साँसे-दिल जैसे दफन किया

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चीखें क्रंदन बस यहां वहां

फटती छाती बस रक्त बहा

कहीं शिशु नहीं माँ लोट रही

कहीं माँ का आँचल -आस गयी

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कोई फोड़े चूड़ी पति नहीं

पति विलख रहा है ‘जान’ नहीं

भाई -भगिनी कुछ बिछड़ गए

रिश्ते -नाते सब बिखर गए

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सहमा मन अंतर काँप गया

अनहोनी बस मन भांप गया

भूकम्प है धरती काँप गयी

कुछ ‘पाप’ बढ़ा ये आंच लगी

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सुख भौतिक कुदरत लील गयी

धन-निर्धन सारी टीस गयी

साँसे अटकी मन में विचलन

क्या तेरा मेरा , बस पल दो क्षण

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अब एक दूजे में खोये सब

मरहम घावों पे लगाते हैं

ये जीवन क्षण भंगुर है सच

बस ‘ईश’ खीझ चिल्लाते हैं

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उधर हिमाचल से हिम कुछ

आंसू जैसे ले वेग बढ़ा

कुछ ‘वीर’ शहादत ज्यों आतुर

छाती में अपनी भींच लिया

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क्या अच्छा बुरा ये होता क्यूँ

है अजब पहेली दुनिया विभ्रम

जो बूझे रस ले -ले समाधि

खो सूक्ष्म जगत -परमात्म मिलन

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कुदरत के आंसू बरस पड़े

तृषित हृदय सहलाने को

पर जख्म नमक ज्यों छिड़क उठे

बस त्राहि-त्राहि कर जाने को

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ऐसा मंजर बस धूल-पंक

धड़कन दिल-सिर पर चढ़ी चले

बौराया मन है पंगु तंत्र

हे शिव शक्ति बस नाम जपें

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इस घोर आपदा सब उलटा

विपदा पर विपदा बढ़ी चले

उखड़ी साँसे जल-जला चला

हिम जाने क्यों है हृदय धधकता

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आओ जोड़ें सब हाथ प्रभू

तत्तपर हों हर दुःख हरने को

मानवता की खातिर ‘मानव’

जुट जा इतिहास को रचने को

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हे पशुपति नाथ हे पंचमुखी

क्यों कहर चले बरपाने को

हे दया-सिंधु सब शरण तेरी

क्यों उग्र है क्रूर कहाने को

—————————-

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५

२.३०-३.०२ मध्याह्न

कुल्लू हिमाचल



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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

harirawat के द्वारा
May 12, 2015

सुरेन्द्र शुक्ल जी, ये दिल की पुकार है, माँ को समर्पित मदर’स डे पर ! माँ जब छोड़ कर जाती है, पर स्नेह पीछे रह जाता है, फुर्सत की चंद साँसों में भी वो दुलार याद आजाता है ! बहुत सुन्दर कविता के लिए साधुवाद ! शुभकामनाओं के साथ ! हरेन्द्र जागते रहो !

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 9, 2015

हे पशुपति नाथ हे पंचमुखी क्यों कहर चले बरपाने को हे दया-सिंधु सब शरण तेरी क्यों उग्र है क्रूर कहाने को सार्थक पंक्तियाँ ,भूकम्प की बिभीषिका का सच्चा चित्रण ,साभार .

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    May 11, 2015

    आदरणीया निर्मला जी आभार आप का प्रोत्साहन हेतु रचना भूकम्प के द्वारा हुयी त्रासदी को व्यक्त कर सकी लिखना सार्थक रहा आभार भ्रमर ५

Shobha के द्वारा
May 7, 2015

श्री शुक्ल जी दिल को दहला देने वाली कविता ऐसी त्रासदी कभी न आये  शोभा

    SURENDRA SHUKLA BHRAMAR5 के द्वारा
    May 9, 2015

    आदरणीया शोभा जी जय श्री राधे सच कहा आप ने आइये प्रभु से प्रार्थना करते रहें ऐसे संकट न झेलने पढ़ें लेकिन इससे छुटकारा नहीं है ऐसे झटके जीवन में आते ही रहते हैं .. आभार आप का प्रोत्साहन हेतु भ्रमर ५


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