Bhramar ka 'Dard' aur 'Darpan'

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माया का जंजाल बनाये

Posted On: 30 Jan, 2016 कविता में

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माया का जंजाल बनाये
==============
मृग नयनी
दो नैन तिहारे
प्यारे प्यारे
प्यार लुटाते
भरे कुलांचे
इस दिल उस दिल
घूम रहे हैं
मोहित करते
माया का जंजाल बनाये
सारे तन-मन
जीत रहे हैं
फिर भी अकुलाये
ये नैना
बिन बोले
कहते कुछ बैना
ढूंढ रहे क्या ?
प्रेम पिपासु
जंगल में भी
आग लगी है
है बारूद घुला
उस झरना
तरु पौधे सब
झुलस रहे हैं
भाग रहे सब
शांति कहाँ है
गाँव नगर या
शहर कहीं से
लगता-
मानव यहां भी आया
धुंआ उठा है
कोहरा छाया
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
९.२५-९.५७ २५.०१.२०१५

कुल्लू हिमाचल भारत

दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
April 7, 2016

श्री सुरेन्द्र जी शहरी करण के पहाड़ों पर पड़ते प्रभाव पर सुंदर लाइनें प्रेम पिपासु जंगल में भी आग लगी है है बारूद घुला उस झरना तरु पौधे सब झुलस रहे हैं

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    April 12, 2016

    आदरणीया शोभा जी रचना की इन पंक्तियों ने आप के प्रकृति प्रेम को उजागर किया रचना आप को भायी सुन ख़ुशी हुयी आभार भ्रमर ५

pkdubey के द्वारा
February 4, 2016

मृग नयनी, दो नैन तिहारे ,माया का जंजाल बनाये -बहुत अच्छा आदरणीय भाईसाहब | पर १२ वी के एक खंड काव्य में मैंने [पढ़ा -मया डसती नहीं उसे,जिसे मायापति स्वयं उबारे ,जिसको रखे राम, उसे किसकी सामर्थ्य की मारे |-सादर आभार |

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    February 29, 2016

    प्रिय दुबे जी हार्दिक आभार प्रोत्साहन हेतु …सही पढ़ा आपने माया डसती नहीं उसे,जिसे मायापति स्वयं उबारे ,जिसको रखे राम, उसे किसकी सामर्थ्य की मारे ये तो सच ही है पर इस रचना का कुछ अर्थ अलग है आज के सन्दर्भ में .. जय श्री राधे


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