Bhramar ka 'Dard' aur 'Darpan'

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आंगन सूना बिन तुलसी के

Posted On 7 Apr, 2016 कविता में

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भोर हुआ, थी रंग -बिरंगी आसमान में छाई बदली
इंद्रधनुष था गगन-धरा मंडप पर शोभित
पुष्प-अधर कलियाँ मुस्कातीं – जैसे गातीं
मन-भावन हे अनुपम छटा से दिल था मोहित !
————————————————–
स्वर्ण झील ज्यों भारत माता उसमे अंकित
स्वर्ण रश्मि बरसाते सूरज कण-कण झंकृत
जय-जय-जय उद्घोष सा कलरव- थे सातों सुर
नाना वर्ण की चिड़ियाँ पूरब- स्वर्ग जमीं पर
———————————————-
ऊंचे-ऊंचे पर्वत वन थे – शांत झील को घेरे
प्रहरी वन जी जान निछावर करते जैसे वर्फ-गोद में सोये
माँ से शीतलता पाने को -योग ध्यान में खोये
पाते और लुटाते पल -पल पाप हरे ज्यों तेरे -मेरे
—————————————————
पर्यावरण को शुद्ध रखे हम आओ पौधे और लगाएं
स्वच्छ वायु में सांस भी ले लें जीवन-जल भी पाएं
कंक्रीट का जंगल विन जल पशु -पक्षी ना आएं
आंगन सूना -विन तुलसी के -दीपक कल फिर कौन जलाए ?
———————————————————–
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
कुल्लू हिमाचल भारत
६ अप्रैल २०१६
८.३० पूर्वाह्न -९ पूर्वाह्न



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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rameshagarwal के द्वारा
April 16, 2016

जय श्री राम सुरेन्द्र कुमार जी पर्यावरण पर बहुत अच्छी भावपूर्ण कविता वैसा प्राकर्तिक माहोल जैसा अपने वरन किया अब देखने को कहाँ मिलता भगवन की बनाई महान प्रक्रति को बर्बाद कर दिया अब पर्यावरण जब खतरे से ऊपर चला गया फिकर हो रही पहले वनों को काट दिया अब पेड़ लगाने को कह रहे सुन्दर कविता के लिए साधुवाद

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    April 18, 2016

    बहुत बहुत आभार आप का रमेश भाई पर्यावरण पर लिखी इस कविता को सराहा आप ने और और अपने विचार व्यक्त किये अच्छा लगा ..आइये अपनी कोशिशें जारी रखें भ्रमर ५

vikaskumar के द्वारा
April 12, 2016

शब्द सुन्दर ,भाव सुन्दर . बड़ी अच्छी कविता लिखी है आपने .

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    April 12, 2016

    विकास कुमार जी स्वागत है आप का ..पर्यावरण और प्रकृति को प्रेम करते हुए रचना को आपने मान दिया ख़ुशी हुयी आभार भ्रमर ५

jlsingh के द्वारा
April 8, 2016

प्रकृति और पर्यावरण का अनुपम संगम आपने करा दिया आदरणीय भ्रमर जी. पर्यावरण को शुद्ध रखे हम आओ पौधे और लगाएं स्वच्छ वायु में सांस भी ले लें जीवन-जल भी पाएं कंक्रीट का जंगल विन जल पशु -पक्षी ना आएं आंगन सूना -विन तुलसी के -दीपक कल फिर कौन जलाए ? बहुत ही सुन्दर पंक्तियां… सादर!

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    April 8, 2016

    आदरणीय भाई जवाहर जी रचना को आप ने सराहा और पर्यावरण बचाने पर बल दिया बहुत अच्छा लगा प्रोत्साहन के लिए आभार भ्रमर ५

Shobha के द्वारा
April 7, 2016

श्री शुक्ल जी पर्यावरण पर लिखी अति सुंदर कविता स्वर्ण झील ज्यों भारत माता उसमे अंकित स्वर्ण रश्मि बरसाते सूरज कण-कण झंकृत जय-जय-जय उद्घोष सा कलरव- थे सातों सुर नाना वर्ण की चिड़ियाँ पूरब- स्वर्ग जमीं परपहली पंक्ति में भारत माता का बेहतरीन चित्रण

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    April 8, 2016

    आदरणीय शोभा जी रचना में भारत माँ की छवि दिखी और रचना को आप ने सराहा अच्छा लगा आभार भ्रमर ५

nishamittal के द्वारा
April 7, 2016

पर्यावरण को शुद्ध रखे हम आओ पौधे और लगाएं स्वच्छ वायु में सांस भी ले लें जीवन-जल भी पाएं कंक्रीट का जंगल विन जल पशु -पक्षी ना आएं आंगन सूना -विन तुलसी के -दीपक कल फिर कौन जलाए ? सुंदर सार्थक प्रस्तुति शुक्ल जी

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    April 7, 2016

    आदरणीया निशा जी रचना सार्थक सन्देश दे सकी और आप ने सराहा अच्छा लगा आभार भ्रमर ५


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