Bhramar ka 'Dard' aur 'Darpan'

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गुमशुदा हूँ मैं

Posted On 17 May, 2016 कविता में

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गुमशुदा हूँ मैं
तलाश जारी है
अनवरत ‘स्व ‘ की
अपना ‘वजूद’ है क्या ?
आये खेले ..
कोई घर घरौंदा बनाए..
लात मार दें हम उनके
वे हमारे घरों को….
रिश्ते नाते उल्का से लुप्त
विनाश ईर्ष्या विध्वंस बस
‘मैं ‘ ने जकड़ रखा है मुझे
झुकने नहीं देता रावण सा
एक ‘ओंकार’ सच सुन्दर
मैं ही हूँ – लगता है
और सब अनुयायी
‘चिराग’ से डर लगता है
अंधकार समाहित है
मन में ! तन – मन दुर्बल है
आत्मविश्वास ठहरता नहीं
कायर बना दिया है ….
सच को अब सच कहा नहीं जाता
चापलूसी चाटुकारिता शॉर्टकट
ज़िन्दगी की आपाधापी की दौड़ में
नए आयाम हैं , पहचान हैं
मछली की आँख तो दिखती नहीं
दिखती बस है मंजिल…
परिणाम – शिखर
शून्य में ढ़केल देता है फिर ..
शून्य – उधेड़बुन चिंता – चिता
‘एकाकीपन’ तमगा मिल जाता है
गले में लटकाए निकल लेता हूँ
अपना ‘वजूद’ खोजने
शायद अब जाग जाऊं
‘गुमशुदा’ हूँ मैं
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
कुल्लू हिमांचल प्रदेश
६/५/२०१६
१०:५० – ११;१५ पूर्वाह्न



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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
May 22, 2016

श्री शुक्ला जी आपकी पहली कविताओं की तरह खूबसूरत कविता मुझे यह हिस्सा अच्छा लगा मछली की आँख तो दिखती नहीं दिखती बस है मंजिल… परिणाम – शिखर शून्य में ढ़केल देता है फिर .. शून्य – उधेड़बुन चिंता – चिता ‘एकाकीपन’ तमगा मिल जाता है गले में लटकाए निकल लेता हूँ

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    May 28, 2016

    आदरणीया शोभा जी रचना का ये उपर्युक्त हिस्सा आप के मन को अच्छा लगा लिखना सार्थक रहा अपना आशीष देती रहें आभार भ्रमर ५

harirawat के द्वारा
May 21, 2016

सुरेन्द्र जी जहॉ नाम तथा गन, बहुत सुन्दर दिल को छूने वाले हर शब्द, साधुवाद कहता हूँ ! चला था मंजिल ढूँढ़ने रस्ते में रावण मिल गया, क्या इंसान इतना भयानक हो सकता है, मैं डर गया !! सोचा भाई हिम्मत से काम ले, तुलसीदास की चौपाय, कंठस्त करले !! फिर धीरज से काम लिया मन में विचार आया, वही अजमाया, रावण कभी दुबारा नजर नहीं आया: शुभ कानमाओं के साथ हरेंद्र रावत =जागते रहो !

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    May 28, 2016

    आदरणीय हरी रावत जी बड़ा सुन्दर लिखा और कहा आप ने जी धैर्य और स्व शुद्धिकरण सब कुछ बदल देता है आभार आप का रचना पर प्रोत्साहन के लिए भ्रमर ५

vikaskumar के द्वारा
May 20, 2016

गहन चिंतन , आपकी रचना में उपनिषदों की परंपरा का स्मरण है .

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    May 21, 2016

    विकास जी हार्दिक स्वागत है आप का यहां , रचना पर आप ने चिंतन किया और आप को ये उपनिषदों से जोड़ सकी सुन बहुत ही ख़ुशी हुयी उपनिषदों की तो बात ही निराली है पूरे जीवन का खाका ताना बाना खींचा हुआ है काश हम उनमे से कुछ भी कर लें भ्रमर ५

Jitendra Mathur के द्वारा
May 20, 2016

आपके दिल से निकली सच्ची बात है भ्रमर जी । छू गई मन को ।

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    May 20, 2016

    जितेन्द्र भाई रचना को आप ने ध्यान से पढ़ा और ये आप के मन को छू सकी लिखना सार्थक रहा आभार भ्रमर ५


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